Tuesday, February 23, 2010

प्यार हमारा


प्यार हमारा
जिसका कोई रूप नहीं है जिसकी कोई भाषा ,कोई बोली नहीं है जो समझता है दिल कि ही बातो को एहसास है तो सिर्फ साथ बंध जाने का तमन्ना है तो अब साथ निभाने की हम तो एक पत्थर है उस रस्ते के जिस से महोब्बत के महल बना करते है मुझे ऐसी अदा से नवाज़ा एह खुदा मेरे महोब्बत का जनुन जब दिल में बसता है तो इस दिल में एक अजीब सा तुफ्फान सा उठता है इतने से काफी हो जाये ये सबब ..एह खुदा कि इश्क कि तनहा साँसे भी मुझे महका देती है उनकी यादे के साये जब घेर के मंडराते है तो चिराग महोब्बत के ही उनके मेरे इर्द गिर्द मंडराते है प्यार हमारा

जिसका कोई रूप नहीं है
.......... (..कृति ..अंजु...अनु...)

Friday, July 31, 2009


अच्छा होता हम बच्चे ही रहते ..
वो कागज़ कि कश्ती ...
वो बारिश का पानी ...
कितन अच्छा तो वो बच्चपन का
खेलना ...मस्ती भरे दिन थे ..मौजो की थी राते
ना कुछ सोचना....न कोई चिंता ...
मस्त मौला सा था सब वातावरण
अच्छा होता हम बच्चे ही रहते ....

क्यों हम बड़े हो गए है ..
दुनिया की रीत में खो गए है
क्यों हम भी मशीनी हो गए है
खो गया है भावनायो का समंदर ...
क्यों अपने भी अब बेगाने हो गए है
क्यों यहाँ बेगाने अपने हो गए है ...........

अच्छा होता हम बच्चे ही रहते ..
कम से कम दिल के सचे तो होते
अब देखो झूठ से लबालब हो गए है ..
चापुलूसी के घने जंगल में गहरे खो गए है
भटक गए है काया और माया के जाल में
यहाँ आके सब खूबसूरती के दंगल में फंस गए है

अच्छा होता हम बच्चे ही रहते .....
लड़ते झगड़ते पर साथ तो रहते
पर अब तो सब्र का पैमाना यू छलकता है
किसीकी छोटी सी बात भी नश्तर सी लगती है
तोडी सब्र की सारी सीमायें ...
हर दोस्त को दुश्मन बनाते चले गए ...

अच्छा होता हम बच्चे ही रहते ....
खेलते वो खेल जो मन में आता हमारे
कम से कम दिलो से तो ना खेलते थे हम ..
कभी छिप जाते ...कभी रूठ जाते
कम से कम संगी साथी हमहे
कही से भी ढूंढ़ तो लाते..
मानते हमहे साथी मिन्नतें करके
परअब क्या किसी से रूठना .और क्या है किसी को मनाना
कौन है अब जिस है अपना बनाना ...
हम पहले भी अकेले थे....और
अब भी अकेले है ......
अच्छा होता हम बच्चे ही रहते ...........
(.....कृति ...अनु..(अंजु)..)

Saturday, March 28, 2009

अजन्मी बच्ची की पुकार .........


अजन्मी बच्ची की पुकार .........
माये ..क्यों तू ही मेरी दुश्मन बनी
क्यों तू खुद को ही मारने चली ...
किया तुने एक घर को रोशन
एक बंश बेल को बढने दिया ...
फिर क्यों ????????
तूने मानी सब की बात
क्यों नहीं सुनी अपने दिल की आवाज़
ओह माँ ......ओह माँ
क्यों तूने जन्म से पहले मेरी बलि देदी ??????
(.....कृति....अनु......)

Wednesday, March 25, 2009

जीवन है ये एक कटी पतंग..............



जीवन है ये
एक कटी पतंग
यह मै मानती हू
दिन को तो ढलना है
शाम होने पर
सब जानते है
फिर भी ...सूरज सुबह होते ही आता है
डरता नहीं डूबने के डर से ,
वो ऊबता नहीं ,अपनी ही दिनचर्या से
रोज़ नयी हिम्मत जुटा ..
बिखेरता अपनी रोशनी
इस सारे जहां में
फिर मै क्यों घबराऊ
आने वाले कल से ...
क्यों डर जाऊ
अपने अंतिम समय से
उड़ती पतंग की डोर
को किसी की डोर तो काटेगी
पर काटने से पहले ,क्यों ना मै अपनी
ऊँची से ऊँची उड़न उड़ जाऊ
जीवन है ये
एक कटी पतंग
(.....कृति ....अनु......)