Thursday, May 13, 2010


मासूम सी अदा

हर शाम चले जाते हो कल का वादा करके
लेकिन तुम बिन कैसे रात गुजार पाएंगे
जाने क्या कहते है वो इन दो निगाहों से
ऐसा लगे जैसे मोहब्बत का पैगाम
सुना कर चले जाते है हमको
मासूम सी अदा ....ख़ामोशी तेरी मुझ से कुछ कहती सी है
आयो साथ चले .....साथ तेरा ...ये एहसास करवाए की तू साथ है मेरे
दूर हो ..पर ऐसा लगे की हर आवाज़ पे ..मेरे ही साथ हो
वफ़ा के सारे वादे निभा गए
आये हो तुम मेरी जिंदगी में
जिंदगी में समां गए हो
हमने जिसको भी छुया..
वो गम दे गया है जिंदगी में
तनहा छोड़ के मुझको
सब चले गए चुपचाप से
जब से हुई है तुम से मुलाकात मेरी
क्यों ऐसा लगे की अब तुम मेरी ही
आरजूयो और दुआयो का नतीजा हो ...........

((......अंजु चौधरी ...(अनु..)

मै जी लूंगी...मै जी लूंगी .......


मै जी लूंगी...मै जी लूंगी .......
अजीब है इस दिल की हसरते भी
पास हो कर भी दूरियाँ हैं कितनी
छुने का मन करता है
पर उसके खो जाने का भी डर
सताता हैं
बैठे है हम पास उनके इतना
मन की आवाज़ को भी वो छू सकते है
जब भी बोलने लगे लब मेरे
वो क्यों धुँया सा हो जाते है ?
एहसास मेरे
शब्दों की भाषा समझते है
सुनता है दिल धडकनों को अगर
वो दर्द की दवा मांगता सा क्यों है?
हमने तो लफ़्ज़ों में उतरा है हर दर्द को
पर तुमने तो दर्द को ही हिस्सों में बाँट दिया है
लो शब्द तुम ले लो
एहसास मुझे देदो
जीत का सहेरा तुम पहनो
अपनी हार का जश्न मै मना लूंगी
खुद में जीने की तमन्ना मै जगा लूंगी
मेरी खुशियाँ आई जो दरवाज़े पर
उस में भी तुम अपनी हिस्सेदारी ले लो
मै खाली पड़े दिल में ही
खुद से जश्न मना लूंगी

मै जी लूंगी.....मै जी लूंगी....
(अंजु ...चौधरी.....(अनु.)

Wednesday, February 24, 2010

मेरी तन्हाई






















(आज मैं अपनी एक पुरानी पोस्ट आप सबके साथ साँझा कर रही हूँ ....इसे मैंने २४ फरवरी २०१० में लिखा था ....शब्दों के बदलाव के बिना और बिना किसी एड्टिंग के आप सबके सामने लाई हूँ )



मेरी तन्हाई में ,
किनते आंसू थे  
कि तुझे से दूर होकर  भी
तेरे पास थी मैं    
चांदनी थी अपने चाँद के साथ  
फिर भी बहुत उदास थी मैं | 

मेरे चाँद को छिपा लिया बादलों ने

जो मेरे मन की 
चांदनी की आखिरी आस था  

सिमट गए मेरे सब सपने
उस अधूरी रात में
अब,टूट गए सब सपने 
तुम्हारे आने की आस में |

क्यों किसी ने ना सुनी 
मेरे बचपन और जवानियाँ
तनहा मैं जी गई
कितनी ही जिन्दगानियाँ
कमज़ोर हूँ..अकेली हूँ ...
फिर भी कि आँखों के बिन रोए 
अश्क सी हूँ    
मै वक़्त का वो भूला बिसरा लम्हा हूँ  
या 
तेरी निगाहों में खटका वो तिनका हूँ  
जो,वो कहते है बोझ मुझे ,
पर,अब मैं तो खुद के ही 
बोझ से भी हल्की हूँ |

ये मन अब किसी रिश्ते में ना बंध पाएगा
फिर भी , 
आज भी है इस दिल में 
हजारों आरजुएँ
जो  कभी नहीं होंगी 
रहनुमाई सी 
भटकन बडी है इस 
प्यार की राहों में
जिस पर अब  मुझे ही चलना है
क्यों 
मेरी तन्हाई में ,इतने आंसू थे ||

 अंजु (अनु)

अजीब सी उलझन में है ये मन


अजीब सी उलझन में है ये मन
अजीब सा ये एहसास है
उम्र के इस मौड़ पर
क्या किसी के आगमन का ये आभास है
क्यों अब ये दिल जोर जोर से धड़कता है
क्यों हर पल उसकी ही सोचो का दायरा है
हर पल ऐसा लगे कि वो मेरे साथ है
क्या उसे भी मेरी तरह इस बात का एहसास है
कि है कोई जो इस दिल के तारो को अब झनझनाता सा है
आ आ कर सपनो में अब वो जगाता सा है
क्यों वो धीरे धीरे मेरे लिए ही गुनगुनाता सा है
अजीब सी उलझन में है ये मन.............
क्यों मै अब नए सपने बुनने लगी हूँ
क्यों इस नयी इस दुनिया में विचरने लगी हूँ
क्यों खुद से ही मै बाते करने लगी हूँ
अरमानो के पंख लगा ...
लो उड़ चला अब मेरा मन
क्यों प्यार के इस नए एहसास से अब मन
डरा डरा सा है
मेरे मन और तन कि भाषा
अब बदली बदली सी है
मेरी आँखों में अब नए सपनो कि दुनिया
अब सजी सजी सी है
है बदलाव का नया नया दौर ये
क्यों मै तरु सी खुद में ही अब
सिमटी सिमटी सी हूँ
अजीब सी उलझन में है ये मन.............
(..कृति..अंजु..(अनु..)