Tuesday, June 24, 2014

लकीरें



इन आड़ी-तिरछी लकीरों से
खींचती है ज़िंदगी एक तस्वीर
एक सोच
एक द्वंद्ध
एक लड़ाई 
इस बेरहम जिंदगी से

एक सोच
उस खालीपन की कसक
कुछ तो करना है
जो अभी अधूरा है

एक जद्धोजहद
उस खालीपन की
जिसके इंतज़ार में
उम्र निकलती जा रही है

खाली से टेबल पर
खाली से वक़्त में
कागज़,पेंसिल से खेलने की कला
जो बेमतलब खींच देती है
किस्मत की लकीरों को
इन आड़ी-तिरछी रेखाओं की तरह ||





ये तन्हाई भी क्या चीज़ होती है, बेकार बना देती है इंसान को
क्या करेगा ये दिल यूं ही , पुराने पन्ने पलट-पलट कर ||


(एक ही शॉर्ट में लिखी गयी कविता को यूं अब ब्लॉग में रखने की सोची है .......इस कविता में भी लिखने के बाद कोई भी बदलाब नहीं किया गया )



अंजु चौधरी अनु

Friday, May 9, 2014

माँ कैसे जान लेती है दिल की हर बात


 
माँ 
शब्द एक  
पर,खुद में सम्पूर्ण 

माँ 
कैसे जान लेती है 
दिल की हर बात  
हर जज़्बात को 
जीवन चक्र 
शैशव से यौवन तक के 
सफर को 
और आँखों में 
झलकते किसी के प्यार को 

माँ 
शांत, सौम्य 
पर दिल से धरती सी मजबूत  
उसकी फुलवारी में महकते 
हर फूल की 
महक को वो कभी 
खोने नहीं देती और 
अपने मौन को टूटने नहीं देती 

उसकी आँखों के पानी को 
जब तक समझो 
वो भाप बन कर उड़ चुके होते हैं 
वो,हर दुख को झाड लेती है
जीवन जीने के लिए   

माँ 
जो पल-पल अहसास करवाती है 
अपने होने का 
अपनी चुप्पी और बोलती हुई आँखों  से 
 
उसके कमरे का वो कोना 
उसके अपने पलंग की 
वो ही साइड
और साइड टेबल पर रखा हुआ 
उसकी दवाइयों का डिब्बा 
जो बरसों पुराना है 
उसकी अपनी यादों की तरह  
और उसी जगह पे 
वो बरसों से बैठ कर 
अपनी आँखों के चश्मे को 
थोड़ा नीचे कर 
देखती है 
हर आने जाने वाले को 

माँ, झट से जान लेती है 
हमारी हर कमजोरी को 
तभी तो बिन बोले भी 
हम दोनों के बीच निरंतर 
मीठे पानी की एक शांत 
झील बहती है  

हर बार उसके इस वात्सल्य से 
हम सब चकित रह जाते हैं  
और सोचते रहते थे कि
माँ कैसे जान लेती है दिल की हर बात 

अंधेरी दलहीज हो या रोशनी आपार 
पीढ़ा हो या प्यार का मिलाजुला प्रवाह 
अब मुझ से भी हो कर गुज़र रहा है 
हम दोनों के बीच की 
प्रवाहित नदी से ही तो 
मैंने जाना 
माँ और बच्चो के बीच का अटूट रिश्ता 
और इस लिए अब मैं भी कह सकती हूँ 
कि 
हाँ! माँ जान लेती है दिल की हर बात ||

-- 
अंजु चौधरी (अनु)


(नितीश मिश्र की कविता से प्रेरित )

Saturday, May 3, 2014

एक सोच फेसबुक के लिए


चहल-पहल की इस नगरी में 
हम तो निपट बेगाने है 
जपते राम नाम सदा 
हम उसी के दीवाने है 

बेगानों की इस दुनिया में 
सजे बाज़ार मतवालों के हैं 
छीन ले जो खुशियाँ सभी 
ऐसे दुश्मन भी  नहीं बनाने हैं 

भूल कर सब बैठे घर अपना 
ऐसे यहाँ बहुत दीवाने हैं 
सजा लेते चाँद तारों से अपना दामन 
लोग कैसे-कैसे इन कैदखानों में हैं 

हर हाल में करते खुद को गुमराह 
बिन पैसे यहाँ तमाश-खाने हैं 
मिलता दर्द जिनकी पनहा में 
हमें ऐसे घर नहीं बनाने हैं ||


अंजु चौधरी (अनु)



Tuesday, April 29, 2014

उसकी आखिरी रात में



उसकी आखिरी रात में 
साँसों का चलना 
और 
साँसों का रुकना 
इसी के बीच 
रुक-रुक के चलती जिंदगी 

पर वो 
जिंदगी की आखिरी रात 
सो कर नहीं बिताना चाहती 

वो भूल जाना चाहती है  
कि 
वो एक औरत है 
एक स्त्री, एक माँ है 
एक बेटी और एक बहन है 
किसी के घर की  
वो  खुद के लिए एक संसार 
रचना चाहती है 

उसके आँसू, उसकी हँसी
और उसके दर्द की परछाई
जिस में छिपी है उसकी जिंदगी की सच्चाई 
जिस से वो   
बाहर निकलना चाहती है 
जो फर्ज़ और दायित्व के नाम पर 
उसकी पीठ पर लाद दी गयी है 

वो पत्थर तोड़ती,
किसी के घर के धोती बर्तन 
या मजदूरी की कीमत पर 
अस्मत पर वार सहती 
जिसको हर किसी ने कम समझा 
कम ही आँका 

फिर भी वो अपनी 
पथरीली और काँटों की 
राहों को त्याग 
खुद के लिए 
मखमली राह का  
निर्माण करना चाहती है  

अपनी आखिरी रात 
अपने ही अंदर आँसुओं को ओढ़ कर 
नहीं सो जाना चाहती 

एक आत्मविश्वास सी परिपूर्ण 
नए समाज का निर्माण कर  
वो तो नवजात शिशु सी किलकारी के साथ 
विदा लेना चाहती है  

उसे अपने 
विस्तार के लिए 
किसी समुंदर की जरूरत नहीं  
उसकी उन्मुक्त उड़ान ही 
उसकी उपस्थिति है इस जाहन में 

है अब 
उसका खुद का आकाश,
खुद का विस्तार
खुद की जिंदगी की 
आखिरी सांस  
उसकी आखिरी रात में |

अंजु चौधरी (अनु)