Saturday, July 26, 2014

नकली चहरे






तेरह साल का परेश रंगमंच के हॉल की सफाई किया करता था |वहाँ रोज़ कोई ना कोई साहित्य से जुड़ा बड़े नाम का व्यक्ति आता ही रहता था |

इसी के चलते परेश के दिमाग में नित-नई कहानी/कविता जन्म लेती ही रहती थी तो वो सब अपनी कॉपी में लिखता रहता था||उसने एक दो बार कोशिश की कि नाटक रचने वाले उसकी कहानी भी पढे पर,हर किसी ने उसे छोटा समझ का नजरंदाज कर दिया| वो मायूस होकर फिर से अपने काम में लग जाता था |पर उसे पक्का विश्वास था कि कामयाबी का एक दिन उसके हिस्से भी लिखा होगा जो सिर्फ उसके लिए होगा |
ऐसे ही दो साल ओर बीत गए |एक दिन उस रंगमंच की रौनक देख कर वो समझ गया की आज कोई बड़ी हस्ती यहाँ आने वाली है|सामने लगे बैनर पर मशहूर कथाकार ऋतु कपूर का नाम देख कर वो बेहद खुश हो गया |भले ही वो उन्हे नहीं जानता था पर वो भी लिखती हैं ये ही बात उसके लिए बहुत बड़ी थी सही वक़्त पर कार्यक्रम शुरू हो गया वहीं ऋतु जी ने अपने भाषण में नए बच्चों को लेखन सीखने के लिए मुफ्त की शिक्षा देने की बात कहीजिसके चलते उन्होने अपने नाम के पर्चे भी पूरे हॉल में बँटवा दिए और वही पर्चा परेश को जब मिला तो उसने भी उसे संभाल कर रख लिया |

   ओर एक दिन इसी के चलते वो ऋतु जी के घर जा पहुंचा और अपनी लिखी कहानियाँ उनके चरणों में रख दी और कहा ‘’मैंने जो जो लिखा हुआ था वो सब इस में हैंअब इस से आगे मैं आपसे सीखना चाहता हूँ’’|परेश से कॉपी लेते हुए वो बोली ''देखो बच्चे ! मैंने इसे रख रही हूँ आराम से पढ़ कर तुम्हें बताती हूँमैं फोन करूंगी बस तब ही तुम मुझ से मिलने आना |''

दिन,महीना और फिर दो महीने बीत गए परेश को ऋतु जी का कोई फोन नहीं आया परेश ने कुछ वक़्त के बाद उनसे संपर्क बनाने की बहुत कोशिश की पर हर बार नाकाम हो गया,तभी उसे किसी से पता चला की कपूर मैडम जी की एक नई कहानियों की किताब आई है जो बाज़ार में बहुत धूम मचा रही है,उसने वो किताब खरीदी और जैसे जैसे उसने कहानियाँ पढ़ी उसकी समझ में आ गया कि क्यों ऋतु जी उस से मिलने का मन नहीं बना सकी |आज वो समझ गया कि उसके जीवन की अब तक की सारी पूँजी लुट चुकी है,वो जान चुका था कि इन बड़े नाम वालों के भी नकली चहरे हैं |

Tuesday, June 24, 2014

लकीरें



इन आड़ी-तिरछी लकीरों से
खींचती है ज़िंदगी एक तस्वीर
एक सोच
एक द्वंद्ध
एक लड़ाई 
इस बेरहम जिंदगी से

एक सोच
उस खालीपन की कसक
कुछ तो करना है
जो अभी अधूरा है

एक जद्धोजहद
उस खालीपन की
जिसके इंतज़ार में
उम्र निकलती जा रही है

खाली से टेबल पर
खाली से वक़्त में
कागज़,पेंसिल से खेलने की कला
जो बेमतलब खींच देती है
किस्मत की लकीरों को
इन आड़ी-तिरछी रेखाओं की तरह ||





ये तन्हाई भी क्या चीज़ होती है, बेकार बना देती है इंसान को
क्या करेगा ये दिल यूं ही , पुराने पन्ने पलट-पलट कर ||


(एक ही शॉर्ट में लिखी गयी कविता को यूं अब ब्लॉग में रखने की सोची है .......इस कविता में भी लिखने के बाद कोई भी बदलाब नहीं किया गया )



अंजु चौधरी अनु

Friday, May 9, 2014

माँ कैसे जान लेती है दिल की हर बात


 
माँ 
शब्द एक  
पर,खुद में सम्पूर्ण 

माँ 
कैसे जान लेती है 
दिल की हर बात  
हर जज़्बात को 
जीवन चक्र 
शैशव से यौवन तक के 
सफर को 
और आँखों में 
झलकते किसी के प्यार को 

माँ 
शांत, सौम्य 
पर दिल से धरती सी मजबूत  
उसकी फुलवारी में महकते 
हर फूल की 
महक को वो कभी 
खोने नहीं देती और 
अपने मौन को टूटने नहीं देती 

उसकी आँखों के पानी को 
जब तक समझो 
वो भाप बन कर उड़ चुके होते हैं 
वो,हर दुख को झाड लेती है
जीवन जीने के लिए   

माँ 
जो पल-पल अहसास करवाती है 
अपने होने का 
अपनी चुप्पी और बोलती हुई आँखों  से 
 
उसके कमरे का वो कोना 
उसके अपने पलंग की 
वो ही साइड
और साइड टेबल पर रखा हुआ 
उसकी दवाइयों का डिब्बा 
जो बरसों पुराना है 
उसकी अपनी यादों की तरह  
और उसी जगह पे 
वो बरसों से बैठ कर 
अपनी आँखों के चश्मे को 
थोड़ा नीचे कर 
देखती है 
हर आने जाने वाले को 

माँ, झट से जान लेती है 
हमारी हर कमजोरी को 
तभी तो बिन बोले भी 
हम दोनों के बीच निरंतर 
मीठे पानी की एक शांत 
झील बहती है  

हर बार उसके इस वात्सल्य से 
हम सब चकित रह जाते हैं  
और सोचते रहते थे कि
माँ कैसे जान लेती है दिल की हर बात 

अंधेरी दलहीज हो या रोशनी आपार 
पीढ़ा हो या प्यार का मिलाजुला प्रवाह 
अब मुझ से भी हो कर गुज़र रहा है 
हम दोनों के बीच की 
प्रवाहित नदी से ही तो 
मैंने जाना 
माँ और बच्चो के बीच का अटूट रिश्ता 
और इस लिए अब मैं भी कह सकती हूँ 
कि 
हाँ! माँ जान लेती है दिल की हर बात ||

-- 
अंजु चौधरी (अनु)


(नितीश मिश्र की कविता से प्रेरित )

Saturday, May 3, 2014

एक सोच फेसबुक के लिए


चहल-पहल की इस नगरी में 
हम तो निपट बेगाने है 
जपते राम नाम सदा 
हम उसी के दीवाने है 

बेगानों की इस दुनिया में 
सजे बाज़ार मतवालों के हैं 
छीन ले जो खुशियाँ सभी 
ऐसे दुश्मन भी  नहीं बनाने हैं 

भूल कर सब बैठे घर अपना 
ऐसे यहाँ बहुत दीवाने हैं 
सजा लेते चाँद तारों से अपना दामन 
लोग कैसे-कैसे इन कैदखानों में हैं 

हर हाल में करते खुद को गुमराह 
बिन पैसे यहाँ तमाश-खाने हैं 
मिलता दर्द जिनकी पनहा में 
हमें ऐसे घर नहीं बनाने हैं ||


अंजु चौधरी (अनु)