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Sunday, August 9, 2015

उसके लिए (सरोकार की मीडिया)



फेसबुक पर एक लेखक वर्ग ऐसा है जो हम जैसी घरेलू लेखिकाओं से बहुत डरता है क्योंकि हमारा लिखा (चाहे थोडा लिखें) तारीफ़ पाता है |ज्यादा की चाह के बिना हम अपना काम निरंतर करते रहने में विश्वास रखती हैं , इसी लिए हमारे मित्र और नए जुड़ने वाले दोस्त अपने आप से हमारे लिखे को छाप कर, वक़्त वक़्त हमें प्रोत्साहित करते हैं |ऐसे में अगर हम दिल से उन्हें आभार व्यक्त करते हैं तो इस से उस लेखक वर्ग को परेशानी क्यों होती है |
क्या इसका मतलब ये निकाला जाए कि ऐसे लोग घरेलू महिलाओं(जो अब लेखिका भी हैं) को आगे आने ही नहीं देना चाहते या फिर कोई उन्हें भी टक्कर दे सकता है, इस बात से डरते हैं |
ख़ैर ये कुछ जाहिलों की सोच है जिसके चलते हमारे लेखन में कभी कोई फर्क ना आया है और ना आएगा...जिसे जो सोचना है सोचे |
गजेन्द्र साहनी के अखबार ''सरोकार की मिडिया'' में अपनी कविता को देख कर उतनी ही प्रसन्नता हुई थी जितनी की पहली बार छपने पर हुई थी ...तब भी आभार व्यक्त किया था और आज भी गजेन्द्र साहनी की''सरोकार की मीडिया'' को आभार एवं शुभकामनाएँ .......
अखबार की कटिंग के साथ साथ अपनी लिखी कविता भी यहाँ पोस्ट कर रही हूँ ....
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उसके लिए

उसके लिए
आधी से ज्यादा जिंदगी
एक दुस्वप्न सी बीती
उसने
ना जाने कितना ही वक़्त
अपने बुने सूत के धागों में
निकाल दिया
मांगे हुए या दान में दिये गए
रेशों में लपेट लिया था खुद को

घर की बड़ी बहू होते हुए भी
वो कभी ना सजी,
ना संवरी
बस हाथ में चार पितल की चुड़ियाँ डाले
हमेशा करछी हिलाते हुए ही मिली
ना जाने कितने ही सपने
उसके भीतर
अपनी मौत मर गए
मौसम भले ही बदलने
बदला ना नसीब उसका,
पलंग का एक कोना पकड़े हुए
कभी खुद पर हँसती
कभी नसीब को रोती
कभी खुद पर नाराज़ होती
गीली आँखे लिए
नज़र आ जाती थी
अच्छे दिनों की आस में
उसका
पल पल बीत गया
दहेज का भी सामान
धीरे धीरे हाथ से
फिसल गया
ना कोई अच्छा दिन आया
ना इज्ज़त ना सम्मान मिला
पर उम्मीद और इंतज़ार का
एक बड़ा सा पहाड़
तोड़ने को मिल गया
फिर भी ...कुछ खास सी
'दिव्य' थी वो मेरे लिए
उसके टूटे-फूटे ब्यान
आज भी दर्ज है
मेरी यादों में
उसका चलना, बैठना,उठना
बात बात पर बिदकना
और फिर झट से मान जाना
ऐसी ही बहुत सी असंभव बातें
जो वो किया करती थी
आज भी अंकित है
स्मृतियों में मेरी
मेरे रीति -रिवाजों की तरह ||
अंजु चौधरी अनु

Monday, April 1, 2013

''miss u'' अप्रैल फूल स्पेशल

ये ''miss u'' शब्द जितना छोटा है लिखने में उतनी ही इस से उम्मीद बडी हो जाती है ...जब आप किसी के साथ खुद को जुड़ा हुआ महसूस करते हो तो कुछ वक्त तक तो ऐसा लगता है जैसे आप उसी की छत्र-छाया में रहें| बस ये खुमारी कभी ना उतरे,पर जिंदगी का सच इस कहीं उल्टा और कड़वा होता है |

जब सच अपनी काटने वाली सच्चाई के साथ आपके सामने खड़ा होता है तो ,ना चाहते हुए भी आपको अपनी  जिंदगी में वापिस आना ही पड़ता है | मेरे ख्याल से मानुष जन्म में कोई भी ऐसा इंसान नहीं होगा जो सपनों में,उम्मीदों में या अपनी पुरानी यादों में अपने खाली वक्त में टटोलता नहीं होगा | तभी तो जब आप किसी के साथ कुछ जुड़ाव की स्थिति में आते है तो ये ''miss u'' कहना या मोबाईल पर या लिख कर भेज देना ही उसके लिए बहुत कुछ हो जाता है |
निराशाजनक परिस्थितियों में हर वक्त उलटा सोचना,निराशा भारी बाते करना और हर वक्त गुमसुम से घंटो बैठे रहना ,बस ऐसे ही दिन शुरू होता और वैसे ही खत्म हो जाता ...एक मशीन की भांति| इस लिए अच्छा है ना किसी के ख्यालों को जिंदगी बना कर ...उसी में खुद को जीवित कर लिए जाए, कम से कम उस वक्त खाओ ,पीओ और मौज मनाओ वाली स्टेज तो रहती है |
कम से कम वक्त-बेवक्त ये बात तो हर वक्त दिमाग में रहती ही है कि मैं...''miss u'' हो रही हूँ | उफ़ कितना सुकून मिलता है ये मैं बता नहीं सकती और बार बार मोबाईल उठा कर उसके पुराने भेजे''miss u'' को पढ़ना उफ्फ्फ वो बताने के लिए भी शब्द नहीं हैं मेरे पास और पलट कर मैं भी ''miss u tooooooooooo''(bade se wala)लिख कर उस पर पलट वार करती हूँ :) | क्या करूँ ज़माना ही ऐसा है ...अगर रिप्लाई ना करो तो सामने वाला ...down market ..लोअर मिडल क्लास समझने लगता है ..और मुझे वो अपने आप को बिलकुल शो नहीं करना ...भई हम आज के वक्त के जीव हैं ...क्या हुआ अगर ईश्वर ने औरत बना कर भेजा है ...दिल तो हम भी रखती हैं ना |
और हम अपने ही बच्चों की होड़ क्यों ना करे ...सुपर मोम हैं हम आज कल की ...जब टीवी पर आज की मोम ...mrs india...aaj kii supar mom...डांस इंडिया डांस (mothers spl) का हिस्सा बन सकती है तो क्या मैं किसी को भी ''miss u'' नहीं लिख सकती |

नोट ..मैं अपनी महिला दोस्तों से सिर्फ ये ही कहूँगी कि ...ये सिर्फ मेरी सोच है जो मैंने देखा और अपने आस-पास होते हुए देख रही  हूँ | किसी व्यक्ति विशेष को मैंने टिप्पणी नहीं की है ...पर आज कल ऐसा बहुत हो रहा है | कुछ वक्त पहले फेसबुक पर किसी दोस्त ने एक प्रश्न किया था कि ...''ये इन दिनों फेसबुक पर महिला रचनाकारों और विशेष रूप से कवियित्रियों की जो भीड़ दिखाई देने लगी है, क्‍या वास्‍तव में उनका कविता और साहित्‍य से कोई वास्‍ता नजर आता है क्या ?
मैंने ये बात आपसे इसलिए शेयर की क्‍योंकि जितनी संख्‍या ऐसी महिला रचनाकारों की है, उससे अधिक संख्‍या उनके ऐसे सो कॉल्‍ड दोस्‍तों की है जो बिना कुछ जाने समझे उनकी तारीफ में बेहिसाब कसीदे गढ़ते हैं।
एक्‍चुअली उनका छद्म मकसद कुछ और होता है||'' 
ये प्रश्न मुझ से पूछा गया था ....बहुत देर तक सोचती रही कि इसका का जवाब दूँ ...हर किसी अपनी-अपनी जिंदगी है, मैं कैसे किसी के बारे में कोई टिपण्णी कर सकती हूँ?|

पर मन नहीं माना और ये लेख उन्हीं के उत्तर में लिखा है |''miss u'' तो लिखने का एक बहाने जैसा हैं ..जैसे अपनी बात रखने के लिए एक भूमिका की जरुरत होती है ठीक वैसे ही | यहाँ ऐसा बहुत कुछ देखने को मिलता है जो एक महिला लेखक होने के नाते कभी-कभी नागवार गुज़रता है |
 हाँ पर मैं इतना जरुर कहूँगी कि वाकई कभी कभी कुछ रिश्ते ऐसे बनते हैं ...जिन्हें हम दिल से निभाते है और उन्हें हम miss भी करते है ...ऐसे सच्चे  रिश्तों के लिए,मैं भी सर झुका कर नमन करती हूँ |पर क्या ये सही बात है कि लोगों का ध्यान अपनी और आकर्षित करने के लिए ...कुछ भी ऐसा किया जाए कि वो झूठे लोग आपकी वाह-वाही करे ...ऐसी झूठी वाह-वाही से अपने आत्म-सम्मान को मत मरने दीजिए ...मैं बस इतना ही कहना चाहती हूँ ||

चलते  चलते बस यूँ ही 



अंजु(अनु)