
किताबें बंद हैं यादों की जब सारी मेरे मन में
ये किस्से जेह्न से रह-रह कौन पढ़ता है
वो बचपन में कभी जो तितलियाँ पकड़ी थीं बागों में
बरस बीते, न अब तक रंग हाथों से उतरता है
वो खेले थे खेल हम बाग़ में सब के संग
आज हम संग ये कौन आँख मिचौली खेलता है
जिंदगी भर मै चलती रही राह दर राह
पर मंजिल से परे अब कौन है जो धकेलता है
मुस्कुराते रहे दिल लुभाते रहे बात कुछ और थी, तुम छुपाते रहे
दर्द जैसे ग़ज़ल हो कोई मै सदियों से गुनगुनाती रही
धड़क उठा जो ये दिल उनके देखने भर से
कहो तो इसमें भला कहाँ मेरी कोई गलतियां है
तुम्हारी सोच के बिना दुनिया तो हमने देखी ही नहीं
हाँ, मगर एक नई सपनो की दुनिया जरुर बनाते रहे
आज जिंदगी से रूठ जाने की हद हो गयी
जिंदगी भर तुम माने नहीं और हम तुम्हे मनाते ही रहे
((((अंजु ....(अनु)))))


