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Saturday, January 25, 2014

नेता और राजनीति


अपने नेताओं में 
पहले जैसी बात कहाँ 
बिन मांगे मिल जाए इंसाफ
अब वो हालत कहाँ

वक़्त के साथ साज़ बदल रहे 
देश में गद्दार बढ़ रहे 
हो रही कुर्सी की होड़ यहाँ 
अब ईमान की
वैसी रात कहाँ 
पहले जैसी बात कहाँ

 


राज़ की बाते राज़ रही
गँवारो के हाथों 
हमेशा सरकार रही
इस देश में अब
पहले जैसी बात कहाँ

बुत बने बैठे हैं

सरकारी अफसर और
रहनुमा यहाँ
विषैली राजनीति में
धरणों की भरमार यहाँ
फिर भी धुल जाते 
सारे पाप यहाँ
अब,पहले जैसी बात कहाँ


कैसा ये गणतन्त्र है

कैसी है ये स्वतन्त्रता
लेश मात्र भी किसी नेता को
कोई लज्जा नहीं  

ना पाप का अहसास है
ना है आदमी असली
मौत भी बेरंग नहीं
बढ़ रहा छल पल पल यहाँ
अब पहले जैसी बात कहाँ ||

                                                             

Saturday, July 27, 2013

हाय ये कुर्सी ! उफ़ ये कुर्सी








हाय ये कुर्सी ! उफ़ ये कुर्सी 
ओ! कुर्सी के निर्माता
एक कुर्सी मुझे भी भिजवा दो
गर्दन और कंधे का
दर्द मिटा दो ||





देखो ना...
इसी कुर्सी के लिए
नेताओं ने
देश के हिस्से
कर डाले
अपनों ने,अपने ही  

मार डालें
उफ़! इस कुर्सी की
महिमा है निराली
जो है आम जनता की
उम्मीदों पर भारी ||

ओ-कुर्सी के निर्माता
ये कुर्सी-लोक है
घूम-फिर कर
सबको यहीं 
है आना 
इस कुर्सी के लिए
हर गठबंधन
बनाया और तोड़ा जाता 
झूठे बयानों का छींका
किसी पर भी
फोड़ा जाता   

सबका सपना है
ये कुर्सी
अब ओर क्या कहूँ 
क्या क्या महिमा
कुर्सी की मैं बतलाऊं   |

हर नेता की आस है
राजनीति की चाल है
ये कुर्सी
 
हत्याधारी, अत्याचारी और
बलत्कारी का बचाव है
ये कुर्सी
कुर्सी की गिरफ्त में
गिरफ्तार हर कोई
उफ़! ये कुर्सी
हाय! ये कुर्सी |


पर,मेरे लिए भी
वरदान है
ये कुर्सी,
काम करने के बाद
कुछ पल आराम के देती है
ये कुर्सी ||


बस
मेरा ये काम करवा दो
दुआ दूंगी
हर वक्त तुम्हें 

इस अनचाहे
दर्द को मिटा दो
ओ-कुर्सी के निर्माता
एक कुर्सी...मुझ को भी                         
भिजवा दो !!!                                                           

            अंजु(अनु)

Monday, March 25, 2013

इस होली में

(जीवन की सोच के हर रंग का मिला जुला सा असर )

इस होली में
रंगों की टोली
रोशनी का उमड़ता हुआ सैलाब बनी
फिर भी
रुकावट के लिए खेद है
क्यों कि
देश को बचाने की
मुहीम भी तेज़ है |

होली के रंगों की तरह
राजनीति भी रंगी है
सच्चे-झूठे वादों के घेरे में
कहीं ...
श्वान कूटनीति
कहीं धमकी का धमाका
कहीं कोई ढूँढ रहा है
एक नया बहाना....
काले शीशे वाली कारों पर
बेअसर हो रहा है
हर रंग मतवाला |

कहीं मुलायम की सरकार
तो कहीं चली मोदी के
भाषण की तलवार
सात रंगों के संग
सब खेल रहें होली
पर देश के नेता और राजनीति की
उतनी ही बदरंग हो-ली
मासूम बेटियों पर अत्याचार से
ना कोई रंग बचा,ना ही कोई उत्साह
इस होली में...
बडी कमी महसूस हुई
प्रतिमान,समय और
समाज-संस्कृति की...
पास-पड़ोस के दिल अब
सूने हुए...
औरतो के सरेआम बेईज्ज़त होने में
इसी वजह से ना है हुड़दंग ,

ना है कोई हो-हल्ला  
ना जीवन में कोई रंग बचा  
इस होली में ||

फिर भी इस होली में
मन की एक खिडकी
खुली सी है
बगिया में तितली
उड़ी सी है
चहुँ ओर बिसरी स्मृतियाँ
 
 स्नहे से लिपटी सी हैं
लेखन की टेबल पर रह कर
मन की भड़ास,
शब्दों में उभरी सी है ||



फिर भी..

रोशनी का एक उमडता
संसार बना तो

जाने किस सोच में
झुक जाती है सबकी नज़रे
कुछ कहो,कुछ सुनाओ
कोई किस्सा तो छेड़ जायो

है मस्ती का आलम
तभी तो
रंगों में रंग कर बिखरा सा है
उड़ता है
अबीर का सहर*(जादू)
घेर रहा सबको
हर ओर से
सात  रंगों के मेल से
जो बुन रहा है,
एहसासों के आईने में
एक सुंदर सपना सा
इस होली में ......||


(आप सबको बच्चों जैसी मस्ती वाली होली की बहुत बहुत शुभकामनाएँ )

अंजु(अनु)