
मैं और मेरे गीत
तिमिर के उस पार
जाना चाहती हूँ
एक नया गीत
लिखना चाहती हूँ
मैं और मेरे गीत
खुद को पढूं और
खुद को लिखूं
मेरे बाद इसे
पढना हैं किसने
कागज़ और कलम
के ज़रिये ...
मैं और मेरे गीत
गीत सूर्य का हो
या हो नदी का ..
दूर तक ...
पर्वत के आर पार
शब्द भी बोलते से हो
जीवन में कुछ धीमी सी
गति से बढते से हों
किसी किसी की
किस्मत में होता हैं
अपने खुद के गीत
बना के उनमे
खुद को जीना और
उस में ही मर जाना
मैं और मेरे गीत.....
गीत में मेरे शब्द
सौन्दर्य प्रतिमा ..
साथ में नग्नता का भान
देते हुए से
गीतों के चमत्कारी शब्द
जयकार पा जाते
पर चुभ जाते है कभी
कांटो से भी ज्यादा ...
इन में भी हैं मानमर्यादा
के सारे बंधन
पर तोड़ कर मैं इनको .....
इन सबसे दूर
असर के उस पार
उड़ जाना चाहती हूँ
मैं और मेरे गीत ........
सूखे बिस्तर सी
चादर से गीत
भागती जिन्दगी ,
फूलो की महक ,
दर्द तो कभी ,
तपती धूप
तो कभी इस भूखे पेट
की आवाज़
कहीं ..पिया प्यार
तो कहीं प्रणय दुलार
की चहकन..
तो कहीं गुस्से में
झटक देते और
कहीं दुआ देते
मैं और मेरे गीत ......
अनु