Friday, July 29, 2011

एक राजकुमारी ...............(सबकी एक कहानी )


एक राजकुमारी

मै अमर नाथ...उम्र ७८ साल ...
आज अचानक मेरी कार के सामने एक औरत ( देखने के बाद लड़की तो नहीं कह सकता ) गई ...अगर वक़्त पर ड्राईवर ने ब्रेक ना लगाईं होती तो उसे कुछ भी हो सकता था .....मैंने कार से उतर के आस पास देखा ...मुझे कोई नज़ार नहीं आया...पास खड़े लोगो से पूछा तो सबने ''ना '' कहा की कोई नहीं जानता उसे....ड्राईवर की मदद से मैंने उसे कार की पिछली सीट पर लिटा दिया और मै खुद आगे ड्राईवर के साथ बैठ गया...और गाड़ी को घर की ओर मोड़ दिया | घर आते ही मैंने जोर जोर से सावित्री ...सावित्री आवाज़े मारनी शुरू कर दी ....सावित्री ..मेरी पत्नी ....जो कुछ दिन से बीमार थी ...और उसकी की दवा लेके मै घर रहा था ...तो ये हादसा हो गया ...मेरी आवाज़ सुन सावित्री ...बाहर गई ...और आते ही बोली ..''क्यों घर आते ही इस तरह शोर मचा देते हो ....अब आप दादा ...नाना बन चुके हो ...कभी तो घर में आराम से दाखिल हुआ करो ''........
''लो कर लो बात...मेरी बात सुनी नहीं और तुम शुरू हो गई हो ...पहले देख तो लो की हुआ क्या है फिर बोलना '' और मैंने इशारे से उसे कार के पास बुलाया ...वह पिछली सीट पर उस औरत को देख कर चौंक गई .....''हाय ...किसे उठा लाये ...जब देखो सड़क की हर मुसीबत को घर लेके चले आते हो ...पता नहीं कौन ..किस की जनी है ??किस की बीवी ..किसकी माँ ...कोई अता पता है क्या इस मुई का....देखो तो लाडली कैसे आराम से सो रही है ....बाप की कार है ना ......'' ये तो जब शुरू होती है तो बंद ही नहीं होती....सावित्री बड़ बड़ करती रही ..और मै उसको ड्राईवर की मदद से उठा का बच्चों के कमरे में ले आया ...|खेर कुछ देर देखा पर उसे होश नहीं आया ....मैंने फटाफट डाक्टर को फोन किया ...वो कार देख कर दवा देकर चला गया ....|
उसे
होश तो आया ...पर वो अपना नाम नहीं बता पाई ....हम दोनों का प्रयास जारी था की किसी तरह उसकी पहचान हमहे पता चल जाये...पर हम असफल रहे ..जब भी उसे देखते तो ऐसा लगता की कोई मासूम सी बच्ची ..जो अभी अभी बचपन छोड़ किशोरी हो रही है ...हर किसी के साथ घुल मिल जाना ...सबसे बाते करना ....किसी को भी पकड़ के उसके साथ कभी लुक्का छिपी ....कभी ताश.....तो कभी भी लूडो खलने बैठ जाती और खूब हसंती ....और सबको अपने साथ बच्चा बना के ही दाम लेती ....मेरे सुने घर में जैसे बहार सी गई ..सावित्री का अकेलापन कैसे दूर हो गया पता भी नहीं चला ...बीबी मेरी थी ..पर तारीफ हर वक़्त उस अनजान की करती थी..
और
मैंने देखा..की सावित्री ने उसका नाम भी रख दिया था...गुडिया...हां जी गुडिया ....थी भी वैसे ही...हर हरकत बच्चों जैसी ...लगता ही नहीं था की ये कोई ४०...४२ साल की औरत होगी ....उसका अपना कोई सामान उसके पास नहीं था ..वो मुझे पहले भी खाली हाथ ही मिली थी ...ऐसे कैसे पता चलता कि वो कौन है ....पर दिन प्रति दिन वो हम लोगो की बनती जा रही थी ...
कभी
कभी ऐसे चुप कर जाती थी जैसे किसी बहुत गहरी सोच में बैठ का अपने मन का मंथन कर रही हो..और दूसरे ही पल ..फिर वही बचपन ...बातूनी इतनी की ..कभी कभी मुझे बोलना पड़ता की .......गुडिया चुप हो जा बेटू...बाबा के सर में दर्द हो गया ....तो भाग का अम्मा....अम्मा चिल्लाती और अपनी अम्मा से मेरे लिए तेल लेके आती ....और गाना गाती .......
सर
दर्द बाबा का
मालिश
करूँ ....दबा दूँ
इतना की
बाबा को नींद जाये
बाबा सपनो में खो जाये
फिर एक परी
आएगी ..
बाबा की गोद में
समाएगी ...
बाबा करे उसे
प्यार .........
और फिर जोर से चिल्लाने लगती .......तेल मालिश ...तेल मालिश .......और जोर से हँसने लगती ......वो पहेली बनती जा रही थी ....हम दोनों के लिए ...उसके व्यवहार में मैंने एक बात और देखी की वो अपने हम उम्र के आदमी को देख मेरे पीछे छिप जाती थी ...जैसे वो उसे कटने दौड़ा हो या भाग का अंदर अपनी अम्मा के पास चली जाती ....घर कर हर काम करती ...भागती फिरती घर भर में ....सबका मन लगा हुआ था उस के साथ |आज गुडिय को मेरे घर आये दिन हो गए थे ... आज मेरा जन्मदिन था ..और मै जानता था की मेरे दोनों बेटे आज घर जरुर आएँगे ....वो कहीं भी रहें...आज के दिन घर आते ही है ...मै जैसे ही अपने नित्य कार्यक्रम से निपट का अपने कमरे से बहार आया ...तो देखा गुडिया ....अपने ही बाग़ के फूलो का एक गुलदस्ता लिए मेरी और बड़ी रही थी ...और आते ही बोली ...बाबा.....जन्मदिन मुबारक हो ...मै हैरान रह गया की इसे कैसे पता ....मै कुछ पूछ पाता वो बोली ....आज पापा की याद गई ...आज उनका जन्मदिन होता है ...तो सोचा आपको मुबारक दूंगी तो ऐसा लगेगा की मेरी शुभकामनाएं मेरे पापा को मिल गई ...और अपनी गीली आँखे लिय वो मेरे सामने से हट गई ....और मै सोचता रहा....कि ये सब क्या है...सोची समझी साजिश या उसका भोलापन ......इस से पहले मै उस से कुछ पूछता ..अंदर से उसका शोर और बाहर....बच्चों की गाडी कर रुकी ....वो बात वैसी ही रह गई ...सबसे मिलने जुलने में ही वक़्त बीत गया....मेरे पोते पोतियों में गुडिया ऐसे मस्त हो गई जैसे उसके अपने बच्चे हों ...|
पूरा
घर बच्चों की आवाजों से गूंज उठा ...आज मेरा सूना चार दिवारी का मकान ....घर बन गया था ...मेरे साथ साथ सावित्री भी बहुत खुश थी ...तभी बडे बेटे ने गुडिया के बारे में पूछा ...तो उसको भी मै कुछ नहीं बता पाया ..बस इतना ही कहा की हो सके तो अपनी बहन मान लो .....मै नहीं जानता की कौन है ..कहाँ से आई है ..
पर
जब कार के आगे आई थी तो लगा था जैसे किसी अच्छे घर की बेटी या बहू है ...और मेरी आँखे भीग गई ये बात करते करते ...मैंने देखा..की विजय (मेरा बड़ा बेटा ) बहुत ध्यान से गुडिया को देख रहा है ...वो बोला ''पापा मुझे लगता है इसको मैंने पहले भी कहीं देखा है ''...उसकी बात सुन कर मुझे बिजली से भी तेज झटका लगा ...आँखे खुली रही और आवाज़ कहीं खो सी गई ....बहुत हिम्मत करके मैंने उस से कहा '''कहाँ देखा ..बोल बच्चे....इस नादान का है कोई ....वो भी इसके लिए परेशान होगा ....बोल ना बेटा...कौन है ये ...हम तो बहुत कोशिश कर चुके....थाने में भी रिपोर्ट करवा दी है...आज दिन से किसी का कोई फोन नहीं ..इसका कोई आता पता नहीं ...''
''पापा ...पापा प्लीस आप शांत बैठो ....मुझे सोचने दो ....अभी कुछ दिन पहले ही तो ..???????''
'' हां पापा ...याद आया....मै और कपिल एक मीटिंग के लिए हरिद्वार गए थे ....वहां ये उसी कंपनी की तरफ से आई हुई थी जिन से हमारी मीटिंग थी ....बहुत अच्छे से बात की थी ...इसने हम सबका बहुत अच्छे से स्वागत भी किया था .....और आप जानते है... ...ये कविता भी लिखती है.....सबका स्वागत कविता से इसने ही किया था ...हम सबके ओनर में .... दिन की मीटिंग के बाद हम सब गए ....पर ये यहाँ कैसे ...ये मै भी नहीं समझा ''....''आप रुको ....मै कपिल को यहाँ बुलाता हूँ ...शायद वो हमारी कोई मदद कर सके ...'' और कुछ ही देर में कपिल भी हम सबके साथ था....ओह ...हां ........कपिल ...विजय का जिगरी यार .....बेस्ट फ्रेंड ...वो भी चहकता हुआ मेरे घर में प्रवेश हुआ .......और गुडिया को देखते ही ......उफ़ ...उस वक़्त उसकी शक्ल जो मैंने देखी...जो मैंने समझा...बहुत हद तक बात मेरी समझ में गई थी....कपिल की नज़रे बहुत कुछ बता रही थी...और गुडिया....कपिल को देखते ही चिल्लाने लगी ...और कुछ देर में चिल्लाते हुए बेहोश हो गई .....|
विजय
ने कपिल को अलग कमर में किया और दरवाज़ा बंद करके ...जो बाते की ...वो हम सबको चौकाने वाली थी ....सारी कहानी....इसके .... छिपे पात्र ..और गुडिया की ये दशा मेरे सामने ...एक चलचित्र की तरह साफ़ थी ......ऐसा लगा की मेरी खुद की बेटी की ये दशा मेरे किसी अपने ने की है .....इतना दुःख मुझे....मुझे अपने किसी करीबी के मरने का नहीं हुआ था....जो आज मुझे कपिल की बातो से सच जान कर हुआ.......|
कपिल
तो सर झुका के माफ़ी मांग कर चला गया...अब सच जान कर मै क्या करूँ....कैसे करूँ....दिमाग को जैसे लकवा मार गया......बच्चों के शोर से मुझे होश आया...
तब ये ही सोचा की जो बात कपिल ने बताई ...वो विजय और मेरे बीच ही रहेगी ...इस घर में और गुडिया के घर में इस बात को कोई नहीं जान पाएगा ....विजय को बहन की इज्ज़त का वास्ता देकर ...चुप रहने का वादा लिया .......और अपनी गुडिया के घर फोन किया .....|
गुडिया
के पति को आने में घंटे लगे ..और ये वक़्त मेरे लिए ऐसा था जैसे मेरे सामने मौत का खेल चल रहा है ..और मुझे ये भी नहीं पता की मै बचूंगा की नहीं ....|
आने वाला इंसान....अच्छे घर का लगा...बड़ी गाड़ी....सलीकेदार ड्राईवर ....और खुद भी महंगे कपडे ...कुल मिला के वो शख्स अमीर लगा ....आते ही मेरे पैर छुए ...और बोला...''अमरनाथ जी आप ही है ना......आपने ही मुझे फोन किया था ......मै..अनिल कुमार....नीरू का पति ''....हां नीरू ..(मेरी गुडिया का असली नाम )..''.और ये मेरी बेटी दिव्या...और बेटा दानेश ..कहाँ है नीरू ... दिन का बोलके गई थी ...की ऑफिस के काम से जा रही हूँ ...पर ऑफिस से पता किया तो वो बोले अभी और दिन लगेगे ....और आज एक दाम से आपका फोन गया ....सब ठीक तो है...''
''हां हां सब ठीक है ...आप बैठे तो बेटा जी ....वो नीरू की मेरी कार से टक्कर हो गई थी ...ज्यादा नहीं बस थोड़ी कमजोरी है.....वो कुछ दिनों में ठीक हो जाएगी ...आप चाहे तो उसे घर लेके जा सकते है ''...मैंने अपनी बात को विराम देते हुए उनकी तरफ देखा ..उनकी आँखों से लगा की वो सब गुडिया से मिलने के इच्छुक है ....मैंने विजय को बुला कर उनके साथ गुडिया के कमरे में भेज दिया |
कुछ
देर में अनिल...नीरू को लेकर चला गया....मेरी कोई बेटी नहीं थी ...आज ऐसा लगा की मैंने भी कन्यादान किया ...आज मेरी बेटी विदा हो कर ससुराल गई ..पर वो भी ऐसे...जो एक बाप कभी नहीं चाहेगा .....जाने से पहले गुडिया मेरे गले लग कर रोई...और बोली बाबा.....क्या मै आपकी गुडिया बन के फिर सकती हूँ यहाँ इस घर में ......और मैंने उसके सर पर हाथ रखते हुए आशीर्वाद के साथ यहाँ फिर से ...बार बार आने का निमंत्रण दे डाला ...की ये उसका मायका है वो कभी भी सकती है ....पर जाने से पहले उसने मिलने के बहाने मुझे छिप कर हाथ में एक कागज़ पकड़ा दिया...जिसको मैंने सब से छिपा अपनी जेब में डाल लिया |
सब
चले गए ....मेरा घर....फिर से मकान बन गया...सिर्फ ईंट पत्थर का मकान ..जहाँ मै और सावित्री रहे गए ...एक नये इंतज़ार में...की कौन सा मौका आएगा की इस मकान में फिर सब एक साथ होंगे ...खेर...जाते वक़्त जो कागज़ का टुकड़ा गुडिया ने दिया वो निकाल के मै पढने लगा उस में लिखा था '''बाबा ...मै जानती हूँ आप और विजय भाई मेरा सच जान गए है ......पर बाबा मेरा यकीन करना इन दिनों में मुझे सच में कुछ भी याद नहीं था ...कुछ वक़्त के लिए मै भूल चुकी थी की मै कौन हूँ ..बाबा...अगर आप सच में मुझे अपनी बेटी मानते है तो उस कपिल का सच उसकी बीबी के सामने जरुर रखना....आज उसने मुझे बर्बाद कर दिया....दोस्ती करके करीब आया...और मेरे ही विश्वास का खून करके....मेरी इज्ज़त लूट कर ...मुझे नशा देकर मरने के लिए सड़क पर फ़ेंक दिया ....और नशा भी ऐसा की मै अपनी ही सुध खो बैठी ....मै तो खुद को नहीं बचा पाई ...पर मन में एक आग है...की कपिल फिर से ऐसा किसी लड़की ...किसी औरत के साथ ना करे....आपने अनिल से ये सच छिपा लिया .... पर कब तक बाबा.....वो मै खुद नहीं जानती .....बाबा.....मुझे इन्साफ दिला दो ....ये विनती है आपकी गुडिया की ....बाबा अगर आपका मन कहें की कपिल को सज़ा मिलनी ही चाहिए तो मैंने उसके खिलाफ सारे सबूत...अपने कमरे में रख दिए है ....बस इतना ही कहूँगी .............

एक राजकुमारी

जिसके सपनो में
अब आंसू है
जो मिले है उसे
किसी की कुटिलता
भारी बातो से
क्यूंकि ....
वो नारी है ...
पत्नी और माँ है
बहन है किसी की
बंदिशों में बंधी है उसकी
हर उड़ान मन की
पंख है ..पर
उड़ना नहीं चाहती
उन्मुक्त आकाश में
तोड़ कर जंजीरे इस ..
अपने प्यारे से
जहान की ...

एक सपना झूठा सा
जीने का विश्वास दे गया
पांवों में बांध बेड़ियाँ
जिन्दगी भर
कांटो भारी राह पर
चलने का आभास दे गया
नयनो में चुभ गए
मेरे खुद के आंसू
कदम बढ़ाते ही आगे को
फिसले पाँव गीत -घट फूटा
झुलस गई लतिका तरुणाई
बिखर गया मन का श्रृंगार
इच्छा है मन की
कि
तट मेरा ना
मझधार बने
स्नहे -छावं ना छूटे
और ना उनकी छाया
पथ में मेरे
अंगार बने .......(बाबा...आपकी गुडिया )
गुडिया का वो मुड़ा....हुआ कागज़ पकड़े...मै यूँ ही ज़मीन पर बैठ ना जाने क्यों रो पड़ा ...मेरे मन की पीड़ा मुझे से सही नहीं जा रही थी....तो उस फूल सामान औरत का क्या हाल हुआ होगा ....जो कुछ दिन पहले किसी की हवस का शिकार हुई ...जिस में उस औरत का कोई दोष भी नहीं था ...उसने उसके शरीर से नहीं ..उसकी आत्मा ..उसके विश्वास ..उसकी दोस्ती..का बलत्कार किया था ...उसी वक़्त मैंने अपने मन और वचन से खुद से ये वादा किया कि मै कपिल की पत्नी को उसके सच से रूबरू जरुर करवाऊंगा ...ताकि आगे से कोई गुडिया....कोई औरत उसकी हवस का शिकार ना बने |
और दिन के इंतज़ार के बाद मैंने गुडिया को फोन किया ......और कहा...''बेटू..तुम्हारे बाबा ने तुम्हारा मान रख लिया ...अब कभी भी अपने बाबा के घर तुम सर उठा के जाना'' ||

(अनु)

47 comments:

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

कहानी ने झकझोर दिया, कार्पोरेट जगत में स्वयं को प्रतिष्ठित कहने वाले लोगों के घृणित कारनामों को आपने अच्छे ढंग से प्रस्तुत किया। कपिल जैसे नीच लोग हर जगह मिल जाते हैं।

रश्मि प्रभा... said...

bejod bejod ... meri aankhen barasne lagi

amrendra "amar" said...

जिसके सपनो में
अब आंसू है
जो मिले है उसे
किसी की कुटिलता
भारी बातो से
क्यूंकि ....
वो नारी है ...
पत्नी और माँ है
बहन है किसी की
बंदिशों में बंधी है उसकी
हर उड़ान मन की
पंख है ..पर
उड़ना नहीं चाहती
उन्मुक्त आकाश में
तोड़ कर जंजीरे इस ..
अपने प्यारे से
जहान की ...
UTRKRISH LEKH KE LIYE BADHAI .......
BAHUT HI BHAVPURN ...BADHAI

Mukesh Kumar Sinha said...

ufff!! hindi sahitya ke ek aur vidha me aapka logo ke dilo ko jhakjhorta hua agaaaj!!
sach me duniya badi badard hai, kab kiske saath kya gujar jaye, kiske dil me kya hai, kuchh kah nahi sakte...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत भावपूर्ण कहानी ... हर जगह ऐसे लोंग मिल जाते हैं ... विश्वास का खून करने वाले

वीना said...

एक सपना झूठा सा
जीने का विश्वास दे गया
पांवों में बांध बेड़ियाँ
जिन्दगी भर
कांटो भारी राह पर
चलने का आभास दे गया
नयनो में चुभ गए
मेरे खुद के आंसू

बहुत मार्मिक कहानी....एक सांस में ही पढ़ गई.....

Mridula Harshvardhan said...

Double standards of society are very immaculately depicted in dis story
also heart of Gold of baba has been very nicely etched in words.
had a lump in d throat towards d end.

loved d writing

regards

Naaz

वन्दना said...

anu ji kahani kya thi ek raungte khade karne wala sach tha..........sach kahaa aaj yahi sab samaj me ho raha hai.............jyada kuch nahi kah sakti.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत ही मार्मिक और प्रेरक कथा लगाई है आपने!
अगर यह सत्यकथा है तो इसका महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है!

Rajiv said...

अनु,स्नेह.
बहुत मार्मिक और जागरूक करनेवाली कहानी जैसी सच्चाई बयां करती रचना.तुम्हारी पहली कहानी कि तरह इसमें भी सच्चाई की कड़वाहट है जो इसकी आत्मा है.बहुत सुन्दर और मन को झकझोरनेवाली कृति.

Rakesh Kumar said...

बहुत भावपूर्ण और मार्मिक प्रस्तुति.
मन को झकझोर दिया.
आपका धाराप्रवाह रोचक लेखन
अच्छा लगा.

मेरे ब्लॉग पर आईयेगा.

gc said...

BEBE SACH INSANIYAT KE GHINAONE ROOP KO INSAAN KINN ROOPON ME JHELATA AAYA HAI AUR JHELATA RAHEGA SUNN KAR HI SUDH-BUDH KHO JAATI HAI, HAR INSAAN ME HAIVANIYAT JINDA JAROOR HAI PAR USS PAR AATMIK NIYANTRAN HONA BAHOOT JARRORI HAI SWASTH AUR NIRBHEEK SAMAJ KE LIYE. YE TO EK "GUDIYA" KI KAHANI THI YAHAN PATA NAHIN "KITNO" KA "SHOSHAN" JAATI, DHARM, JOBS AUR AADAMBAR KE NAAM PAR HO RAHA HAI YA "HO CHUKA" HAI.

kumar said...

bahut hi sundar aur maarmik kahani....achha laga padkar

Ram said...

अनु जी इस कहानी को पढने के बाद में कम से कम 10 से 15 min तक खामोश बेठा रहा!

मन को झझोर दिया.............................. सच कहू तो आज सच में ही शब्द नहीं हे

रेखा श्रीवास्तव said...

बहुत सुंदर अनु, कहानी सच हो या फिर कल्पना लेकिन ये एक हकीकत होती है जीवन की, कब इंसान का मन ख़राब हो जाए और वह अपनी दोस्ती के माथे को कलंकित कर दे. कभी किसी औरत ने ऐसा किया होगा शायद नहीं लेकिन ये दोहरा चेहरा लगाये हुए लोग इसी समाज में सम्मानीय बने जीते रहते हैं और कोई गुडिया इस तरह बाबा को नहीं मिलती कि उसे एक घर मिले और प्यार मिले . बहुत सुंदरप्रस्तुति.

Amrita Tanmay said...

ओह !!!अच्छी लगी .

Amrita Tanmay said...

ओह !!!अच्छी लगी .

mahendra srivastava said...

वाह...ऐसी कहानी सच में कभी कभी ही पढने को मिलती है।

जाट देवता (संदीप पवाँर) said...

नीरु की कथा सच थी या कल्पना मात्र।

Kunwar Kusumesh said...

मार्मिक कहानी.

राजीव तनेजा said...

दुखद...मार्मिक...
ऐसे लोगो की अगर पोल ना खोली जाए सबके सामने तो इनकी हिम्मत और अधिक बढ़ जाती है
धारा प्रवाह लेखन पसंद आया

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

maarmik lekh!

SAJAN.AAWARA said...

gudiya ghar me 8 din ke liye rahi sabka man lagakar rakha,bahut acha laga..usne sabse hi ek rista jod liya tha....

uske dost ne uske sath bahut galat kiya, or dosti ke viswaas ka khun kiya....

baba ne ek anjaan ladki ko apne ghar me rakh jisse lagta hai ki wo bahut hi ache insaan hai....

ye kahani hume sikhati hai ki hume manavta ka palan karna chahiye or sach ka sath dena chahiye....

or kisi par jaldi bharosa na kare to hi behtar hai...

jai hind jai bharat

सहज साहित्य said...

अनु आपकी इस कथा ने मुझको बहुत गहरे तक हिला दिया , भिगो दिया ।बहुत बधाई !

R.K.Gupta said...

KAHANI ME KAHI KAHI LAY TUT RAHI HAI......KABHI KUCH NATAKIYTA BHI NAZAR AATEE HAI.......IS KAHAANI KO AUR ACHCHI TARAH SE PESH KIYA JA SAKTA THA....KIONKI VISHAYBASTU BAHUT ACHCHI HE..........

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

बहुत सुन्दर कहानी और कविता भी मज़ा आ गया...बधाई

Sunil Kumar said...

शर्म आती है अपने आप पर की हम इस समाज का हिस्सा है

man na vicharo said...

sach me bahut hi achchi kahani..bahut hi bahetrin tarike se sab ke samne sachchai rakhi ki duniya me bahut kuch aisa bhi hota hai..bahut badhiya annu..mubarak ho is badhiya kahanike liye...

दीपक बाबा said...

दर्दनाक .......

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बहुत ही मार्मिक कहानी है।

सादर

vedvyathit said...

sundr rchna bdhai pr is me itni lmbi kvita ki aavshykta nhi thi han char panch pnkti hoti to chal bhi jatin apne aap me gdy hi pryapt hai jo aap kahna chahtin hain vo sb is me smahit ho gya hai

कविता रावत said...

kahani aur kavita dono padhkar man dravit ho utha...
dilodimag par chha jaane wali yah rachna bahut kuch sochne par majboor karti hai...aabhar

PK Sharma said...

aankhen jhalak aayi anu ji

Udan Tashtari said...

भीतर तक झकझोर गई....

veerubhai said...

भाव उत्तेजन से संसिक्त सौदेश्य रचना .लक्ष्य भेदी संधान सी .कृपया यहाँ भी पधारें .http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/और मुमकिन हो तो यहाँ भी शुक्रिया .
http://veerubhai1947.blogspot.com/

अमित श्रीवास्तव said...

कुछ कह पाना संभव नही..

अत्यंत मार्मिक...

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

उफ़्फ़्‌...
मर्म को छू गयी यह कहानी।

मनुष्य में बसा जानवर क्या कुछ नहीं कर जाता!
इसे साधे रखना बहुत आवश्यक है। समाज के लिए और खुद मनुष्य के लिए।

Babli said...

मैंने सिर्फ़ एक बार नहीं बल्कि दुबारा इस कहानी को पढ़ा! बहुत ही मार्मिक कहानी !

संजय भास्कर said...

बहुत भावपूर्ण और मार्मिक प्रस्तुति....सुन्दर कहानी

daanish said...

सम सामायिक विषय को वर्णित करने का
बहुत ही अनूठा और सार्थक प्रयास
स्तरीय लेखन !!

Maheshwari kaneri said...

बहुत भावपूर्ण कहानी .मार्मिक प्रस्तुति ......

Amit Chandra said...

उफ। अतंरआत्मा को झकझोरने वाली रचना। जितनी तारीफ करूॅ कम है।

अभिषेक मिश्र said...

समाज के कटु यथार्थ से परिचित कराती रचना.

Deewan-e-Alok said...

behad acchi rachna...

मिश्री की डली ज़िन्दगी हो चली said...

very touchy

गुड्डोदादी said...

भावपूर्ण मार्मिक

Aditya Tikku said...

kafi samy baad ek achi khani padi- shukriya- ****

yadi aap ki icha ho va samy ho to mai chahuga aap humari magazine keliye khani likhe.

aditya@surabhisaloni.com