Tuesday, August 2, 2011

हे -गौतम बुद्ध..

(यहाँ आने वाले हर किसी पाठक से प्राथर्ना है कि ..कविता किसी के भी विचारों और भावनायों को आहत करने के लिए नहीं लिखी गई है ...इस कविता को सिर्फ सिर्फ कविता के तौर पर ही पढ़ा जाए )


कभी कभी मै सोचती हूँ
आशा के दीप जलाए
तुम्हे ढूंढ़ रही हूँ

हे -गौतम बुद्ध
तुम ...एक भाव
जरुर हो ....
पर पूर्ण कविता नहीं
अपनी ही कैद से भागे
खुले आसमान के नीचे
क्या मिला वहाँ
विचार,एहसास ..अनुभव...
ज्ञान भी ...बाँट लेने को
मानती हूँ मिला होगा
बहुत कुछ .....
पर ज्ञान वो नहीं जो
जो तुमने
किताबो में लिख दिया
और हमने पढ़ लिया ||

जन्म लिया था..
तो
कम से कम उसे
भोगते तो
देखते ...
कितने उतार चड़ाव
है इस जीवन में
जीवन वो नहीं
जो तुमने जिया

एक पेड़ के नीचे .....
जीवन वो है
जो एक औरत जीती है
अपने परिवार के लिए
माँ,बहन,बेटी और पत्नी
बन के ...
जीवन वो है जो
एक भाई जीता है
अपनी बहनों के लिए
उनके सामने एक आदर्श
रखने के लिए
कर देता है खुद की
इच्छायों का बलिदान
एक परिवार को
उनकी ख़ुशी देने
के लिए
जीवन वो है
जहां चार बाते हो
कुछ झगडा
कुछ प्यार हो
पति पत्नी में
मान- मुनहार हो
तकरार हो
जहाँ ..
इधर उधर की
कह लेने से
मन का गुबार
निकल जाता है
जैसे तैसे
हँसते-खेलते
लड़ते-झगड़ते
ये समय भी
खूब गुज़र जाता है

हे -गौतम बुद्ध
अफ़सोस है मुझे
की एक मिले जीवन को
तुमने यूँ ही
व्यर्थ गँवा दिया
देखे नहीं जीवन के सभी रंग
और ज्ञान के शब्दों में
संसार को बहा दिया
(अनु)

73 comments:

रश्मि प्रभा... said...

हे -गौतम बुद्ध
अफ़सोस है मुझे
की एक मिले जीवन को
तुमने यूँ ही
व्यर्थ गवां दिया
देखे नहीं जीवन के सभी रंग
और ज्ञान के शब्दों में
संसार को बहा दिया... bahut hi badhiyaa

दीपक बाबा said...

अनु जी, सही कहा है आपने - ग्रुस्थ जीवन ही असल में तपस्या है... तप है. और इस कलयुग में तभी ग्रुस्थ आश्रम को ही मह्तता प्रदान की गयी है.

संजय भास्कर said...

वाह! अनु जी बहुत खूब लिखा है आपने! निशब्द कर दिया
अंतर्मन के सूक्ष्म भावों को की खूबसूरत अभिव्यक्ति .....बहुत अच्छी लगी आपकी यह रचना

DECENT said...

Bebe Nice Thaughts

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बहुत बढ़िया।

सादर

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

जीवन जीना और दूसरों के लिए जीवन को उत्सर्ग करना ही तप है ..अच्छी प्रस्तुति ...

लोगों का मानना है कि बुद्ध परिवार के नहीं बल्कि संसार के हो गए थे ...उनके अनुभव से सांसारिक ज्ञान तो मिला पर उनके परिवार को क्या मिला ..कुछ लोंग कहते हैं कि यशोधरा को भी लोंग तभी जानते हैं न जब बुद्ध उनको छोड़ कर गए ...

एक नज़र यहाँ भी --

तथागत

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

रचना अपने आप में सम्पूर्ण है!
आपकी खोज पूरी हो जाए तो हमें भी बता देना!

राजीव तनेजा said...

नई सोच के साथ लिखी गई रचना ..

SAJAN.AAWARA said...

koi garhasth jeevan se moksh praot karta hai to koi sanyashi jeevan se,,,,
achi kavita...
jai hind jai bharat

shuk-riya said...

हमारे जीवन के एक कटु सत्य को...सशक्त ....शब्दों..व्यक्त करने के लिए अनु मैं आप का और आप की लेखनी दोनों का आभारी हूँ..| बातों बातों में कैसे लिखा जाता है....क्या कह हूँ......

जयकृष्ण राय तुषार said...

सुंदर ,सार्थक कविता बधाई अनु जी

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

अन्जू जी! आपकी कविता पढ़कर किसी कविता की एक लाइन याद आ रही है कि-
गिरकर तुमने उदरदरी से जिस पर जन्म लिया है,
खाकर जिसका अन्न सुधा सम नीर समीर पिया है,
वह स्नेह की मूर्ति दयामयि माता तुल्य मही है,
उसके प्रति कर्त्तव्य तुम्हारा क्या कुछ शेष नहीं है?

लगभग इसी भाव को समेटे आपकी यह कविता बहुत सुन्दर बनी है पर दीया दिखाने वाला भी कोई न कोई होना चाहिए, वह भी एक सत्कर्त्तव्य है। पथ प्रदर्शन भी आवश्यक होता है। मेरे ख़्याल से बुद्ध वही कर रहे थे। बहुत-बहुत आभार और साधुवाद

Amit Chandra said...

सुन्दर प्रस्तुति बिल्कुल नए अदांज में।

daanish said...

जीवन की गहरी सोच में कहीं गहरे झाँक कर
एक ऐसे प्रश्न से साक्षात्कार, जो एक अरसे से
अनुत्तरित ही रहा है और शायद ऐसे ही रहेगा ...
काव्य को सम्पूर्णता की ओर ले जाती हुई गरिमामय रचना !

Rakesh Kumar said...

आपकी मेल के आमंत्रण से आपके ब्लॉग पर आना हुआ.
गौतम बुद्ध के बारे में इसी तरह के विचार कुछ और ब्लोग्स
पर भी पढ़े हैं.आपकी प्रस्तुति अच्छी है.
सनातनधर्म के अनुसार जीवन के चार आश्रम ब्रह्मचर्याश्रम,गृहस्थाश्रम,
वानप्रस्थाश्रम और सन्यासाश्रम पूर्ण जीवन के लिए आवश्यक माने गए हैं.परन्तु,कुछ अपवादस्वरूप भी होते हैं.हम किसी को व्यक्तिगत रूप से गलत नहीं ठहरा सकते.यह सब काल,परिस्थिति,अवस्था आदि के ऊपर भी निर्भर होता है

सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.

मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है.

Maheshwari kaneri said...

नई सोच के साथ लिखी गई सुन्दर और सार्थक रचना ..

महेश बारमाटे "माही" said...

@अनु जी, अरुण कुमार झा जी : शायद गौतम बुद्ध के जीवन के बारे मे आपने ज्यादा कुछ पढ़ा ही नहीं...

वे अगर जीवन के बारे मे न जानते तो आज शायद आप किसी भगवान को न मानते, संसार व जीवन के गूढ रहस्यों को न जान पाते... आप लोग खुद भ्रम मे जी रहे हैं कृपया बुद्ध के बारे मे अपने ज्ञान को बढ़ाएँ फिर उन पे कोई कविता या लेख लिखें...

कृप्या उंगली उठाने से पहले अपने गिरेबान मे भी झाँकें... सच की खोज कभी व्यर्थ नहीं होती...

और हाँ ! किसी भी महापुरुष के जीवन को पहले अच्छी तरह जान लें फिर उस पे अपने विचार प्रकट करें, यू ही सस्ती वाहवाही लूटना एक अच्छे व सच्चे ब्लॉगर के लिए हानिकारक है... बेवजह अपना व किसी और का दिल न दुखायें॥

ये मेरे अपने विचार हैं कृपया अन्यथा न लें...

Mitesh aka SM said...

beautiful poem

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

hay gautam buddha!!

अरुण कुमार झा said...

लोग कहते है कि गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ, यह तो कोरा भ्रम है उन लोगों का, जो गौतम के नाम की दुहाई देकर हमें सदियों से मुर्ख बनाते आये है, आपने वैसे लोगों पुनः अपनी बुद्धि को जांचने का सुअवसर दिया है, इस कविता के द्वारा कि भ्रम के जाल को तोड़ कर यथार्थ को समझो, बहुत ही उम्दा और सुविचारित और वैचारिक कविता है, इससे ज्यादा मैं वाहवाही तो नहीं करूँगा अन्य मित्रो की तरह

Kunwar Kusumesh said...

जिसे भगवान की संज्ञा दी जा चुकी हो ऐसे भगवान बुद्ध के खिलाफ कुछ टिप्पणी करने का मुझमें साहस नहीं है.

anu said...

सबसे माफ़ी चाहती हूँ.... कि किसी को निरादर करने के इरादे से ये सब नहीं लिखा....

mahendra srivastava said...

पूरी रचना से नहीं लगता कि किसी का निरादर करने के लिए ये बात की जा रही है। यहां संदेश देने मात्र के लिए गौतम बुद्ध का जिक्र है। इससे रचना की गंभीरता और बढ गई है।

हे -गौतम बुद्ध
अफ़सोस है मुझे
की एक मिले जीवन को
तुमने यूँ ही
व्यर्थ गँवा दिया
देखे नहीं जीवन के सभी रंग
और ज्ञान के शब्दों में
संसार को बहा दिया

बहुत सुंदर

आशा said...

अपना अपना सोच है |अच्छी अभिव्यक्ति |बधाई
आशा

amrendra "amar" said...

वाह, अनु जी बहुत खूब लिखा है आपने
खूबसूरत अभिव्यक्ति******

Babli said...

सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लाजवाब रचना लिखा है आपने ! शानदार प्रस्तुती!
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com

Ram kishan Punia said...

Anju ji,you have expressed the truth.Very well said and great poetry.

अभिषेक मिश्र said...

मैथिली शरण गुप्त जी ने भी तो लिखा था - "सखी वो मुझसे कहकर जाते..."
संजोग से आज उनकी जन्मतिथि भी है.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल कल 04- 08 - 2011 को यहाँ भी है

नयी पुरानी हल चल में आज- अपना अपना आनन्द -

ज्योति सिंह said...

अफ़सोस है मुझे
की एक मिले जीवन को
तुमने यूँ ही
व्यर्थ गँवा दिया
देखे नहीं जीवन के सभी रंग
और ज्ञान के शब्दों में
संसार को बहा दिया
maja aa gaya is chunauti ko dekh magar us samya is vichar dhara ki kami rahi nahi to buddh ka hridya parivartan kiya ja sakta raha ,bahut badhiya .aana sukhad raha .

daddudarshan said...

'सांसारिक-व्यसनों मे खुशी ढूँढने वाले व्यक्ति की स्थति उस कुत्ते के समान होती है जो सूखी हड्डी को बड़े चाव से ये सोचकर खाता है ki खून हड्डी मे निकल रहा है, लेकिन सच्चाई ये है ki वो स्वादिष्ट खून उसके अपने ही दांतों का होता है. ' इतनी स़ी बात भगवान-बुद्ध ने अपने बहुमूल्य-जीवन को
न्योछावर करके हम-सांसारिक प्राणियों को बताई. परन्तु ........................
किसी ने din चुना, किसी ने चाँदनी,कोंई डूबा अँधेरी-रात मे ,
पसंद के अनुसार सब ki ख्वाहिश है,शौगात मे .
प्रस्तुत कविता मे शव्दों का श्रंगार है परन्तु ,कविता विधवा है .

vidhya said...

वाह! अनु जी बहुत खूब लिखा है

Dilbag Virk said...

आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है , कृपया पधारें
चर्चा मंच

anita agarwal said...

हे -गौतम बुद्ध
अफ़सोस है मुझे
की एक मिले जीवन को
तुमने यूँ ही
व्यर्थ गवां दिया
देखे नहीं जीवन के सभी रंग
और ज्ञान के शब्दों में
संसार को बहा दिया...

अंजू ... एक सुंदर रचना के लिए बधाई .... जो लोग गौतम बुद्ध को ईश्वर का स्थान देते हैं उनसे यही कहना चाहूंगी की राम ने सीता को वन में छोड़ दिया बिना किसी गलती के, तो वह मेरी निगाह में गलत था ... ऐसे ही गौतम भी यशोधरा को छोड़ के चले गए, तो यह यशोधरा के प्रति अन्याय हुआ .... किन्तु यह भी सत्य है की किसी बड़े प्रयोजन के लिए किसी को तो हलाहल पीना ही पड़ता है ....
अंजू जी ने एक नारी की व्यथा को समझ कर ऐसा कहा है ...

वन्दना said...

अनु जी
यदि कविता की दृष्टि से देखा जाये तो बहुत सुन्दर भाव हैं आपके मगर यदि दूसरी निगाह से देखा जाये तो भगवान बुद्ध पर एक तरह का आरोप है ये ………मै आपको गलत नही कह रही क्योंकि इस तरह का लेखन यहाँ होता रहता है सब आरोप लगाते रहते हैं फिर चाहे वो कोई भी क्यों ना हों तोभगवान भी कभी कभी कट्घरे मे खडे किये जाते हैं और उसमे भी बुराई नही है मगर जहाँ तक बुद्ध भगवान की बात है उन्होने जब देखा कि ज़िन्दगी की सच्चाई क्या है और अपनी आँखो के आगे तीन घटनायें देख लीं तब उनका जीवन से मोहभंग हुआ और उन्होने सोचा कि इस जीवन का आखिर उद्देश्य क्या है और उसी की तलाश मे वो निकल पडे और ऐसा करना हर किसी के बस मे नही होता ये तो कोई विरला ही होता है वरना तो सारी दुनिया उसी जीवन मरण के चक्र मे फ़ंसी हुई है अगर वो ऐसा ना करते तो वो भी फ़ंसे रहते और ज्ञान का उजाला ना कर पाते जो ज्ञान उन्होने पाया उसे जन जन तक ना पहुंचा पाते जिस से ना जाने कितने लोगो का जीवन बदला है या सुधरा है। अशोक जैसा राजा भी आखिर मे उन्ही के बताये रास्ते पर चलने को मजबूर हो गया कितना बडा नरसंहार किया था उसने फिर भी जो मनुष्य जीवन का परम लक्ष्य है वो उसे उन्ही के बताये मार्ग पर मिला।
मेरी बात को अन्यथा मत लीजियेगा क्योंकि सिर्फ़ कविता की दृष्टि से तो आपकी कविता अति उत्तम है ही इसमे तो कोई शक नही है मगर अध्यातम मे थोडा फ़र्क होता है वहाँ तो त्याग ही करना पडता है।
अगर कुछ बुरा लगे तो माफ़ी चाहती हूँ।

रेखा said...

एक नए अंदाज में लिखी गई सुन्दर रचना .....

DR. ANWER JAMAL said...

आपने एक गहरी सच्चाई को निहायत आसानी से आखिर कैसे कह दिया ?
हम यही सोच रहे हैं.
हू ब हू हमारे विचार हैं ये तो .

टिप्पणी के लेन-देन के पीछे छिपी हक़ीक़त को बेनक़ाब करती हुई एक लाजवाब कहानी
आप क्या जानते हैं हिंदी ब्लॉगिंग की मेंढक शैली के बारे में ? Frogs online

डॉ0 विजय कुमार शुक्ल ‘विजय’ said...

बहुत अच्छी रचना है.यह बुद्ध के साथ संवेदना है न की उनकी बुराई. बुद्ध जीवित होते तो आपसे सहमत होते.अपने विरोधियो पर भी वे कभी इतना रुष्ट नहीं होते थे जितने कुछ ब्लॉगर !

prerna argal said...

कम से कम उसे
भोगते तो
देखते ...
कितने उतार चड़ाव
है इस जीवन में
जीवन वो नहीं
जो तुमने जिया
एक पेड़ के नीचे .अंजुजी क्या बात है बहुत ही सच्ची जीवन का यथार्थ बताती हुई /जीवन के उतार-चदाव को बताती हुई शानदार अभिब्यक्ति /बहुत बहुत बधाई आपको /

shekhar suman said...

aksar apne doston se yahi baatein hoti rahti hain, ki gautam buddh ne sahi kiya ya galat....
meri nazar mein to galat....
baaki jisi jo lage..
pahli baar aapko padha..aur achha laga...
padhta rahoonga...

अनामिका की सदायें ...... said...

kuchh pane ke liye kuchh khona padta hai. sabhi yogi,muniyo,devtao,mahatmaao ne yahi kiya aur tabhi ek pahchaan payi.

mana ki mushkil hai ek grahsth ka jeewan jina bhi lekin kya aasaan hai ek mahatma ban jana?

mridula pradhan said...

naye rang aur bhaw ki kavita bahut achchi lagi....

Babli said...

मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

Vijay Kumar Sappatti said...

अनु ,
देरी से आने के लिये क्षमा.
बहुत ही अच्छी अभिव्यक्ति . गौतम बुद्ध मेरे प्रिय है . मैं उनकी देशना को मानता हूँ और आपने निर्वाण के पथ पर उनकी यात्रा को अपने शब्दों में लिखा है . बहुत ही सुन्दर.
आभार

विजय

कृपया मेरी नयी कविता " फूल, चाय और बारिश " को पढकर अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा . लिंक है : http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/07/blog-post_22.html

Rajiv said...

"जीवन वो है
जो एक औरत जीती है
अपने परिवार के लिए
माँ,बहन,बेटी और पत्नी
बन के ..."
अनु,एक अलग दृष्टिकोण से लिखी गई अत्यंत विचारोत्तेजक रचना के लिए बधाई.लेकिन कभी सोचना कि ऐसी कौन सी परिस्थितियां रही होंगी जिसने उन्हें सभी प्रकार के सांसारिक रिश्तों को तिलांजलि देने को विवश कर दिया.जैसे एक औरत मृत्युपर्यंत अपने परिवार के लिए जीती है,बुद्ध सबके लिए जिए.मुझे लगता है समर्पण का भाव दोनों का सामान था.लेकिन स्त्री का समर्पण मां होने के कारण सदैव आदरणीय है.मन कि गहराई में उतरती रचना.

Sawai Singh Rajpurohit said...

बहुत खूब लिखा है इस रचना के लिए आभार

यहाँ प्रतिदिन पधारे
!!आपका स्वागत है!!
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નીતા કોટેચા said...

annu muje ye bat bahut pasand aai..aur tumhari himmat ki mai dad dungi..ki ye likhne ki tumme himmat hai..kyoki log samajte sab hai par koi kahene ki himmat nahi rakhta...annu mai to sirf budhdha nahi mai to sab se khilaf hu agar droupadi ke chir haran ke samay 5 pati aur itne bade mahatma ya vaha baithe sare log kuch kar na paye to ye bujdili hai..bhale usme se vo koi achcha sandesh dena chahte ho..par ek dag to unhone stri par laga diya ki uske chir haran ki himmat ki kisine.. 5 pati ke hote huve..muje tumhari ye bat padh kar bahut khushi hui ki meri dost inti himmat vali hai jo sach bol sakti hai...aise hi likhti raho..

pramodsp said...

Kavita ke Drushti se thik hai..
Magar agar ye aapake prati buddha ke vichar hai to aap Bahut Balat hai..
Aur ek baat Upar Shekhar Suman ne Bahut Bakwaas Comment Di hai ki Gautam Buddha Galat Hai..
Shekhar suman Apna mu kholane se pahle us vishay ka abhyas kar le.
Vishwa me Bahut saare log Buddha ke bataye maarg par chal rahe..
Shekhar suman Tumhari oukat hi kya jo tum Buddha ko galat bol rahe ho..
Maaf kijiye ye Kavita ka Vishay tha par shekhar suman ke bakvaas ne bolne par majbur kar diya.

Yogesh Waghmare said...

Apaki kavita karate samay Bhagawan Buddha ke jivan ka abhyas thik se nahi kiya hai. Apako unake jivan ka abhyas karana jaruri hai. Koi bhi mahapurush k bare mai pura abhyas na karake likhana keval myrkhata hai jo apane abhi k hai, koi bhi mahapurush ghar mai baithake ya jivan ka pura anad lutake bane nahi hai, unko tyag hi kiya hai isako itihas gava hai. Apako me salah hai apa "Buddha and His Dhamma" lekhak Dr. B. R. Ambedkar padho apaka vichar parivartan ho jayega.

Yogesh Waghmare said...

Abhyas se likhi hui kavita

अभिन्न said...

कविता तो बहुत सुन्दर और प्रभावी है, लेकिन गौतम बुद्ध को यदि जीवन ही भोगना होता तो हम और आप जैसे असंख्य प्राणी जीवन की सभी stages को जी जी कर अंतत:मर ही जाते है ,गौतम भी शायद पूरा जीवन राजसी ठाठ से जी लेता लेकिन उसे तो बुद्ध होना था,पृथ्वी पर एक मात्र और पहला प्रयास बुद्ध ने ही किया की मानवता ही आखिर सबसे बड़ी बात है,उसका धम्म मानव पर आधारित है मानव के लिए है,ज्ञान का वह अन्नत सागर भारत की सीमाओं से बाहर भी फैला और आज तक कायम है,गौतम ने शायद जीवन के सुखों को तिलांजली दी पर उसे व्यर्थ नहीं गंवाया ....हाँ जब ज्ञान ही नहीं होगा तो जीवन के रंग क्या खाक नजर आयेंगे ......भवतु सबब मंगलम ( सब का कल्याण हो),

anand said...

anu ji yogi ka jivan v koi aasan h kya?wo ek raja ke parivar se related they....lekin unhone ne sansar ko dukhon se mukt karane k liye hi ghar chhod diye...

Pushpa Bajaj said...

aap to bade patrakar hain. aapne kis adhar par anu ji ko GAUTAM BUDH se age baitha diya.

bhai! ham to us desh ke vasi hain jahan aise maha tyagi ne apne jiwan ke sansarik sukhon ki kurbani dekar chanda Ashok ko Pridarsi Ashok bana diya.

Mujhe Anu ji se sikayat nahin ! kyonki unke pas josh hai shabd hai par kis shabd par sadhna nahin. sahitya sadhna ki cheej hai. aap to mante hain na??????????????

Pushpa Bajaj said...

anu ji! apke lekh ne hame nirash kiya hai. sach kahoon to aise vicharon walon ko kafir hi kaha jana chahiye. jinhe ek sadhak men budh nahin mahaj sansari hi najar aya.
kya aap sweekar karengi is isi Gautma Budh ki vajah se chanda Ashok Priyadarshi Ashok ban gaye the............

devendra gautam said...

मैं आपकी कविता के भावों से पूरी तरह सहमत हूं. बात संसारी और सन्यासी की नहीं कर्तव्यों की है. जब गृहस्थ आश्रम में आ चुके थे तो उसकी जिम्मेवारियों को पूरा करते हुए अध्यात्म की दुनिया में अग्रसर होना चाहिए था. जिस तरह रात के अंधेरे में पत्नी और बच्चे को छोड़कर गये वह सन्यास नहीं, पलायनवाद था. बुद्ध निःसंदेह एक ऐसे आध्यात्मिक आंदोलन के प्रणेता थे जिसकी उस युग में नितांत आवश्यकता थी लेकिन वे एक मोर्चे के यदि विजेता रहे तो एक मोर्चे के भगोड़े भी रहे. जहां तक दर्शन की बात है, वे तो अनीश्वरवादी थे. कर्मकांड और अवतारवाद के विरोधी थे. एक षणयंत्र के तहत उन्हें भगवान और विष्णु का नवां अवतार घोषित किया गया था. सम्राट अशोक के वंशजों की परिणति पर गौर करने के बाद कनिष्क ने अपना राजकाज सुचारू रूप से चलाने और अपने राजवंश का भविष्य सुदृढ़ रखने के उद्देश्य से बौद्ध सभा बुलाकर बुद्ध के सरल धर्म को हीनयान और महायान में विभाजित कर दिया था. गांधार से मूर्तिकार बुलाकर बुद्ध की मूर्तियां बनवायी थीं और उनकी पूजा शुरू करायी थी. इसीलिये बुद्ध की घुंघराले बालों वाली गांधार शैली की मूर्तियां दरअसल मिश्र के अपोलो की अनुकृति हैं...मथुरा शैली की जटा और दाढ़ी वाली बुद्ध मूर्तियां ज्यादा स्वाभाविक प्रतीत होती हैं. क्या शांति की तलाश में बावरे की तरह भटकने वाला कोई सन्यासी क्लीन शेव्ड और उत्तम केश विन्यास से युक्त हो सकता है...विचार करें....आपकी कविता के भाव बिल्कुल सटीक हैं अनु जी...मेरी बधाई स्वीकार करें...

ranjana bhatia said...

bahut hi sundar rachna lagi yah ..buddh wakai bahut prbahwit karte hain

Pallavi saxena said...

nice...

दिगम्बर नासवा said...

त्याग के बिना जीवन में कुछ पाना संभव नहीं .. और जिसने दुनिया को देनी की सोच ली हो उसके आगे सब बातें बेमानी हो जाती हैं ...

Ramakant Singh said...

गृहस्थ धर्म का भोग, पालन और निर्वहन इतना आसन कहाँ होता है पेल ढपेल कर चलाना कोई बात होती है आपने सच कहा जीकर देखना था .आपको मेरी दो लाइन समर्पित **समय और चक्र http://zaruratakaltara.blogspot.in/2011/10/blog-post_2860.html

अब सिद्धार्थ बुद्ध नहीं बनेगा
शुद्धोधन अपने पुत्र पर

यशोधरा अपने त्याग पर
कभी गर्व नहीं कर सकेंगे।

sadhana vaid said...

बहुत ही उत्कृष्ट प्रस्तुति ! बहुत सुंदर !

Rewa tibrewal said...

bilkul alag rachna....par kaha apne bilkul sahi...grihasth tapsya say badh kar koi tapsya nahi....superb

madhu singh said...

ihlaukik ayr parlaukik ka dwand dikhayee de raha hai,vairgy aur sansarik jiwan ke bich vaicharik dwighatw ,behatareen

Sulabh Jaiswal "सुलभ" said...

अनु जी एवं अन्य टिप्पणीकारों को,
कविता के भाव एवं कथ्य से सहमती रखते हुए ये अवश्य कहना चाहूँगा ....

* किसी भी व्यक्ति का जीवन और उसका दर्शन उसके तात्कालिक सामाजिक दशा, और काल विशेष में राज्य(देश क्षेत्र) की चुनौतियों के फलस्वरूप मोड़ ले लेता है.
* यदि बुद्ध की बात न भी करें, तो भी आज सैकड़ो सामान्य गृहस्थ स्वाभाव और योगी घर छोड़ने को विवश हो जाते हैं, मन की शान्ति के लिए तो कभी ज्ञान रस को आत्मसात करने के लिये.
* कई बार व्यक्ति अपने समाज में शिक्षक/गुरु इत्यादि की तलाश में होता है परन्तु जब कोई नहीं मिलता तो अंतर्मन की पुकार पर वो स्व-चेतना को जगाता है और उसमे लीन हो जाता है, फिर वहां से नयी किरण और नए रास्ते मिलते हैं जो सार मिलता है वो सभी के लिए कल्याणकारी सिद्ध होता है.
* कई बार हम सामान्य गृहस्थ जीवन की चुनौतियों से लड़ते हुए, परिवार के सभी सदस्यों का भरण पोषण करते हुए, बाल बच्चो को अच्छी शिक्षा देने की जीतोड़ कोशिश में इसे 'तप' की संज्ञा दे देते हैं, परन्तु इसी समाज में ऐसे भी व्यक्ति हैं, जो सभी चुनौतियों का सामना करते हुए सम भाव में जीते हैं और मानव मात्र की भलाई के लिए अपना सर्वस्व त्याग करने में हिचकते नहीं हैं। उनको ऐसी प्रेरणा इतिहास के युगपुरुष ही दे पाते हैं। आज जो महान कार्य कर रहे हैं वो भविष्य में इतिहास के पन्नों पर स्वर्णाक्षरों में होंगे। सूक्ष्म ज्ञान के बिना (जो बुद्ध ज्ञान भी है) कोई व्यक्ति अपने मनुष्य रूप की सार्थकता को समझ पाने में पूर्णत समर्थ नहीं है।

* कविताओं का वर्तमान बिम्बों/चुनौतियों से संघर्ष करना ज्यादा जरुरी है उसे जन ग्राह्य बनने के लिए।

और अंत में एक बात कहना चाहूँगा - जीवन के सभी रंगों को जीने के लिए ये जरुरी नहीं कि पुरे साठ वर्ष जिया जाए, ये तो वरदान है जो किसी को 30 की आयु में ही पूर्णता का अहसास हो जाये तो किसी को साठ में भी प्राप्त न हो।

प्रतिक्रया में स्वतः ही टिप्पणी हो गयी।

जय हिन्द !
- सुलभ

Sulabh Jaiswal "सुलभ" said...

दिगंबर जी, सत्य वचन !

Sulabh Jaiswal "सुलभ" said...

अनु जी एवं अन्य टिप्पणीकारों को,
कविता के भाव एवं कथ्य से सहमती रखते हुए ये अवश्य कहना चाहूँगा ....

* किसी भी व्यक्ति का जीवन और उसका दर्शन उसके तात्कालिक सामाजिक दशा, और काल विशेष में राज्य(देश क्षेत्र) की चुनौतियों के फलस्वरूप मोड़ ले लेता है.
* यदि बुद्ध की बात न भी करें, तो भी आज सैकड़ो सामान्य गृहस्थ स्वाभाव और योगी घर छोड़ने को विवश हो जाते हैं, मन की शान्ति के लिए तो कभी ज्ञान रस को आत्मसात करने के लिये.
* कई बार व्यक्ति अपने समाज में शिक्षक/गुरु इत्यादि की तलाश में होता है परन्तु जब कोई नहीं मिलता तो अंतर्मन की पुकार पर वो स्व-चेतना को जगाता है और उसमे लीन हो जाता है, फिर वहां से नयी किरण और नए रास्ते मिलते हैं जो सार मिलता है वो सभी के लिए कल्याणकारी सिद्ध होता है.
* कई बार हम सामान्य गृहस्थ जीवन की चुनौतियों से लड़ते हुए, परिवार के सभी सदस्यों का भरण पोषण करते हुए, बाल बच्चो को अच्छी शिक्षा देने की जीतोड़ कोशिश में इसे 'तप' की संज्ञा दे देते हैं, परन्तु इसी समाज में ऐसे भी व्यक्ति हैं, जो सभी चुनौतियों का सामना करते हुए सम भाव में जीते हैं और मानव मात्र की भलाई के लिए अपना सर्वस्व त्याग करने में हिचकते नहीं हैं। उनको ऐसी प्रेरणा इतिहास के युगपुरुष ही दे पाते हैं। आज जो महान कार्य कर रहे हैं वो भविष्य में इतिहास के पन्नों पर स्वर्णाक्षरों में होंगे। सूक्ष्म ज्ञान के बिना (जो बुद्ध ज्ञान भी है) कोई व्यक्ति अपने मनुष्य रूप की सार्थकता को समझ पाने में पूर्णत समर्थ नहीं है।

* कविताओं का वर्तमान बिम्बों/चुनौतियों से संघर्ष करना ज्यादा जरुरी है उसे जन ग्राह्य बनने के लिए।

और अंत में एक बात कहना चाहूँगा - जीवन के सभी रंगों को जीने के लिए ये जरुरी नहीं कि पुरे साठ वर्ष जिया जाए, ये तो वरदान है जो किसी को 30 की आयु में ही पूर्णता का अहसास हो जाये तो किसी को साठ में भी प्राप्त न हो।

प्रतिक्रया में स्वतः ही टिप्पणी हो गयी।

- सुलभ

वाणी गीत said...

बहुत सुन्दर भाव है कविता के ...जैसे कि " जीवन से भागे फिरते हो , भगवान् को तुम क्या पाओगे "
बाकी ज्ञान का अपना महत्व है !

Kailash Sharma said...

जीवन जीना भी किसी तपस्या से कम नहीं...बहुत सार्थक और सुन्दर प्रस्तुति...

उपासना सियाग said...

सच कहा ....यह भी अपना -अपना नजरिया है ...लेकिन मैं आपसे सहमत हूँ

dharmendra harsh said...

सुन्दर चित्रण

तुषार राज रस्तोगी said...

लाजवाब अभिव्यक्ति |

bharadwajgwalior.blogspot.com said...

ek dam sahi likha hai aapane. jindagi vahi hai jo dusaro ke liye jee jati hai. sirf apane liye to jeev jantu sabhi jeete hai fir maanav aur pashu pakshiyon me koi antar nahi rahata.

rohitash kumar said...

सीधी बात है कि सबको शिकायत करने का हक है...ये कविता किसी का अनादर नहीं है...प्रश्न इंसान की स्वाभाविक आदत है...आपने प्रश्न पूछा ..अब इसका उतर खुद गौतम बुद्ध देंगे या नहीं ये पता नहीं...शास्त्रों में साफ लिखा गया है कि भगवान तो प्यार के भूखे हैं..औऱ प्यार करने वाले उलाहना दें..या प्रश्न करें भगवान बूरा नहीं मानते..उल्टा औऱ ज्यादा प्यार करने लगते हैं....हां उनके भक्त एक दूसरे की टांग खींचने..और यहां तक कि खून बहाने से भी बाज नहीं आते...आपने कोई गलत बात कविता नहीं लिखी है...आपसे पहले एक राष्ट्रकवि कि कविता के सहारे सालों बाद गौतम बुद्भ की पत्नी यशोधरा ने भी गौतम बुद्ध से सवाल पूछा था ..कि अगर वो यशोधरा से बता कर जाते तो क्यो वो उन्हें जाने से रोकतीं....संसार की भलाई का काम करने से वो रोक कर पाप का भागी क्यों बनती...एक शुभ काम में बाधा यशोधरा क्यों बनतीं...
तो आपने एक कविता लिखकर अगर कोई सवाल किया है तो कोई गलत नहीं किया है....बिल्कुल दुरुस्त सवाल है...

prashant dabade said...

बुद्ध को पुरा पढे जाने बादमे िलखे . नमो बुद्धाय