Monday, September 13, 2010

सपने ............


सपने ............

सपने जो सोने नहीं देते
जो किसी को अपना होने नहीं देते
खिड़की पे आया चाँद भी पराया
सा लगता है


मुझे याद है अच्छी तरह से..
हाथो में हाथ था उसका
चार कदम हम भी चले थे मिल के
एक लंबा सफर,
उभरा था इक छोटा सा सपना
मुझे अब तक नहीं मालूम
कि उस दिन
तुम्हारी आँखे
हँसती थी
बोलती थी
या फिर उदास सी थी..
वो उदासी थी या था प्यार तेरा
तेरे जाने के बाद
ढूँढती रहती हूँ
जिस्म से अपने खुशबु तेरी
तुम्हारी आवाज अब भी
लिपटी हुई है चारो और मेरे
झड झड गए वो सारे सपने
आलिंगन सेटूटी नींदे,
क्या जाने अब कितने युगों युगों तक
यू हूँ फिर से सपने सजोने होंगे ??????
(((((अंजु.....(अनु)))))

5 comments:

संतोष कुमार said...

अच्छी कविता ! सपने कभी हसाते हैं तो कभी रुलाते भी हैं !

PKSingh said...

bahut sundar !
...................gaurtalab

priya said...

kya likhti hai aap......padh ke maza aa gaya anu ji
aise hi likhti rahe

Rajiv said...

Anu koi apne sapnon mein rahe ya fir yadon mein,dono mein hi khush rahata hai.Agar ham so hi pate to sapne aate hi kyon.sapne hi to yatharth ke pathreele rashte par fool bankar bich jate hain aur hamari komal bhawnaon ko jakhmi hone se bachate hain.

कविता रावत said...

Bahut achhi rachna