Friday, August 2, 2013

अब भी,मन करता है


              



आज फिर से 
एक बार
भीग जाने का
मन करता है
वो छत का
एक कोना पकड़ कर 

घंटे-दर-घंटे वहीँ
बैठ जाने का
अब भी,मन करता है |

घंटो-घंटो की बरसात में
नंगे पैरों से
छप-छप करते हुए
सूनी पड़ी सड़क पर
कहीं दूर भाग जाने का
अब भी,मन करता है |

बस्ते को प्लास्टिक से 

लपटे हुए
जुराबे-जूते

हाथ में पकड़े  हुए
खुद को जान-बूझ कर
भिगाते हुए
भीगते-भीगते
घर,भाग-भाग कर आने को
हर बार सोचते-सोचते
खुद पर हँसने का
अब भी, मन करता है |

मेरा प्राचीन वक्त
और
गैस पर चढ़ी वो कड़ाही,
अब भी माँ के हाथ के 

आलू और प्याज के पकौड़े,
खाने का मन करता है
वो दादी के हाथों की
चने की दाल की और
मीठी डोली*
चोरी करके,भागने का  

अब भी, मन करता है |

वो इमली,वो राम लड्डू 

वो  छोटे-छोटे बेर 
वो शतूत,वो भुने चन्ने
स्कूल  की कैंटीन के 
ब्रेड पकौड़े,समोसे 
और साथ में 
गरम-गरम चाय का कसोरा
और उसकी चुस्कियाँ
उफ़ उन कमबख्त यादों में
डूब जाने का
अब भी,मन करता है |


अब की,बरसात में भी
बिना कष्ट साँस लेती हूँ
अपने ही अंतहीन
संग्रह के लिए
खुद के आँसुओं को
सबसे छिपान के लिए
इस बरसात में भी
खूब भीगने का
मन करता है |
 
(*एक तरह की घर की बनी हुई कचौड़ी ) 
अंजु(अनु)

57 comments:

ashish said...

मन जो करे करना चहिये , बरसात में पर्स को पन्नी में लपेट लो . सैंडिल हाथ में ले लो . कौन रोकता है . हा छत पर बहुत देर तक भीगने वाले कार्यक्रम में जुकाम होने की प्रबल सम्भावना है .

Anju (Anu) Chaudhary said...

एक दम सही है जी

Ashok Saluja said...

यादों में अक्सर ,,बचपन में जाने को मन करता है ...
आप भी मन की बात मानिये ...अच्छा लगेगा !
शुभकामनायें!

Ashok Khachar said...

bahut khub.bhigne ka bhi apna mza hai............

Pallavi saxena said...

यादों की बरसात में भीगी हुई इस खूबसूरत रचना को बार-बार दौहराने को मन करता है। :-)

ताऊ रामपुरिया said...

बरसात और पुरानी यादें, एक लाजवाब चित्र खींचा है आपने, बहुत ही पुरानी यादों को ताजा कर दिया.

रामराम.

sadhana vaid said...

आपकी रचना को पढ़ भाग कर अपने भी बचपन की वीथियों में फिर से लौट जाने को मन करता है ! बहुत ही आत्मीय सी रचना ! अति सुंदर !

shorya Malik said...

बिलकुल सही कहा,इन सबको फिर से करने को बहुत मन करता है

Brijesh Singh said...

सुनहरी यादें और उनकी निश्छलता कभी पीछा नहीं छोड़तीं। बहुत ही सुन्दर! हार्दिक बधाई आपको।

Anju (Anu) Chaudhary said...

ताऊ जी जब याद करने बैठो तो बहुत सी बाते याद आ ही जाती है :)

Anju (Anu) Chaudhary said...

सही कहा आपने

कुशवंश said...

कभी कभी मन कुलांचे भरने लगता है , कभी कभी मन को कुलांचे भरने दीजिये बेहद सुकून मिलता है ....बेहतरीन यादें अनु जी

premkephool.blogspot.com said...

बहुत ही सुन्दर! रचना

तुषार राज रस्तोगी said...

आपको यह बताते हुए हर्ष हो रहा है के आपकी यह विशेष रचना को आदर प्रदान करने हेतु हमने इसे आज के ब्लॉग बुलेटिन - इंतज़ार उसका मुझे पर स्थान दिया है | बहुत बहुत बधाई |

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा आज शनिवार (03-08-2013) के गगन चूमती मीनारें होंगी में मयंक का कोना पर भी है!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

सतीश सक्सेना said...

सुबह सबह क्या याद दिला दिया..

वाणी गीत said...

मीठी मधुर यादें !
सच में अभी भी किसने रोका है , बाहर नहीं तो बालकनी या छत पर सही !

Anju (Anu) Chaudhary said...

आभार

Anju (Anu) Chaudhary said...

आभार

अनुपमा पाठक said...

मन करता है अपना भी यही सब दोहराने का जो कविता कह रही है...

काश हो पाता!

Minakshi Pant said...

Sundar rachna .....ab bhi man karta hai ...man hai hi aisa chain se baithta hi nahi ...

अरुन शर्मा 'अनन्त' said...

आपकी यह रचना आज शनिवार (03-08-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

प्रतिभा सक्सेना said...

मन में रहता है एक बच्चा जो बार-बार सिर उठाता है -सुनता नहीं किसी की!

Rewa tibrewal said...

bachpan ki yadon say bhari is rachna ko bar bar padh bachpan aur barsat yaad karne ka man karta hai.....didi bahut sundar rachna

उपासना सियाग said...

बहुत बढ़िया ....सच में …अब भी मन करता तो है ही

"नेह्दूत" said...

bachpan ki bow baate ab bas khayalo me hi milengi........
Khubsurat yaade......

Jai said...

बारिश !
कम्बख्त , पुराने ज़ख्म हरे कर जाती है , इसके बाबजूद भी ये कितनी अच्छी लगती है,
उन सभी यादों को दुहराने के लिए शुक्रिया !!!

Jai said...

बारिश !
कम्बख्त , पुराने ज़ख्म हरे कर जाती है , इसके बाबजूद भी ये कितनी अच्छी लगती है,
उन सभी यादों को दुहराने के लिए शुक्रिया !!!

ranjana bhatia said...

ab bhi man karta hai kai baato ka jo bachapn thaa ..sahi likha .bahut badhiya

वसुंधरा पाण्डेय निशी said...

बचपन में पहुंचा दी आप अनु जी ...बहुत सुन्दर !

Sulabh Jaiswal "सुलभ" said...

"ये मन और वो बचपन " बहुत कुछ होता है इसमें ....
-
सुलभ

Ramakant Singh said...

अनु जी आपने बचपन से चलकर जीवन के हर को छूकर दर्द के एहसास को आसुओं से भिगो दिया बेहद सुन्दर भावों की अभिव्यक्ति

तुषार राज रस्तोगी said...

मन के हारे हार है मन के जीते जीत तो वही करो जो मन कहे | बेहद भावपूर्ण अभिव्यक्ति |

Maheshwari kaneri said...

बरसात और पुरानी यादें, बहुत बढ़िया

Dr. sandhya tiwari said...

man to vapas laut jana chahta hai bachpan ki shararton me lekin mushkil lagta hai vo sukh paana

मेरा अव्यक्त --राम किशोर उपाध्याय said...

Swarnim ateet ko sametti bahut sundar rachna ....

sushma 'आहुति' said...

भावो का सुन्दर समायोजन......

sushma 'आहुति' said...

भावो का सुन्दर समायोजन......

Amrita Tanmay said...

हाय! हाय! हमारा भी मन होने लगा..

Aparna Bose said...

सचमुच बचपन में लौट जाने का बहुत मन करता है. बहुत ही प्यारी रचना। अब बस एक दिन छत पे जाकर बारिश का आनंद ले ही लीजिये ,ज़िन्दगी बहुत छोटी है मन की इच्छाओं को जहाँ तक हो सके पूरा कर लेना चाहिए।
क्षितिजा का cover बहुत सुन्दर है. congrats अंजू जी

Reena Maurya said...

बचपन की वो सुनहरी यादों में फिर से जीने को मन करता है.... सरल , कोमल .सुन्दर भावाभिव्यक्ति....
:-)

Anita said...

बचपन के दिन भी क्या दिन थे... सुंदर भावपूर्ण रचना !

Mukesh Kumar Sinha said...

hame bhi aisa hi bachpan fir se jeene ka man karta hai ........par kaise :)

poonam said...

aapne bachpan yaad kara diya...abhar

rohitash kumar said...

लो जी चार दिन पहले ही भीगा था...गरम गरम चाय पी थी...समोसे और ब्रेड पकोड़े खाए थे..कसम से जी मजा आ गया..बस जी बस्ता न था कंधे पर...न जूते हाथ में....

rohitash kumar said...

मेरा कमेंट कहा गया

rohitash kumar said...

ये कोई बात है.....बताइए भीगे हम भी ..कुछ दिन पहले ..समोसे खाए ..ब्रैड पकौड़े खाए...बस जूता हाथ में न लिया..बस्ता था नहीं सो पन्नी में लपेटा नहीं...आपका ब्लाग गुस्से में हमारा कमेंट खा गया..ये अच्छी बात नहीं

Anju (Anu) Chaudhary said...

लों जी आपके सारे कमेन्ट आ गए .......अब तो खुश है ना आप

संजय भास्‍कर said...

....बहुत सुंदर रचना दी

दिगम्बर नासवा said...

इस कम्बख्त बरसात से भी कितनी यादें जुडी होती हैं .. खत्म लेना का नाम नहीं लेती ...
बचपन से जवानी तक का सफर लौट आता है हर बरसात के साथ ...

CS Devendra K Sharma "Man without Brain" said...

bhigi bhigi kavita!

bahut badhiya!

Mahesh Barmate said...

bahut sundar Anu ji...

दिगम्बर नासवा said...

अब मेरा कमेन्ट गायब हो गया ...

Kailash Sharma said...

सच में पुरानी यादों में डूबने का बहुत मन करता है...बहुत ख़ूबसूरत प्रस्तुति...

ASHOK ARORA said...

सच मेँ ..वापस ले जाती ही एक बार से ..उस कल मेँ...जो.. कहीँ .खो गया और सही कहा कि अब तो बस....
खुद के आँसुओं को
सबसे छिपान के लिए
इस बरसात में भी
खूब भीगने का
मन करता है |

Ankur Jain said...

कुछ चीज़ों के लिये हमेशा ही मन करता है...

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...



आज फिर से
एक बार भीग जाने का मन करता है
वो छत का
एक कोना पकड़ कर
घंटे-दर-घंटे वहीँ बैठ जाने का
अब भी, मन करता है...



बरसात के बहाने बचपन की स्मृतियों में चले जाना बहुत अच्छा लगा आदरणीया अंजु अनु चौधरी जी

♥ (मैंने भी कुछ दिन पहले छत पर बरखा में भीगते हुए तीस-पैंतीस साल पहले के ज़माने को याद किया , परिणाम स्वरूप एक-दो गीत और आठ-दस छंद मां सरस्वती की कृपा से बने)

हां, सुंदर भावुकता भरी रचना के लिए नमन !

शुभकामनाओं सहित...
-राजेन्द्र स्वर्णकार