Monday, September 9, 2013

दंगो की मार









फिसलता सिंदूर

सारे रंग
सारी रोशनियाँ,
सारे मौसम
और अंश-अंश तुम्हारा
बिखर गया
इन दंगो की मार में
मेरी मांग से ही क्यों
तुम्हारा दिया
सिंदूर फिसल गया ||

************************

दंगे
गुलमोहर के कुछ ऊपर से
फिर ऊपर से कुछ ऊपर,
जहाँ से आज की सांझ
बहुत रुलाती है
खंड-खंड टूटता हुआ
आदमी
आदमी को ही कुचलता हुआ
आगे बढ़ता है |

जहाँ,साम्प्रदायिकता की आग
हर किसी की चेतना को
तोडती हुई आगे बढ़ती है
गली-कुचों में
बिखरी लाशें
सत्ता के भूखे भेड़ियों या
फिर धर्म के नाम पर रची जाने वाली
साजिशों की ....
किसकी चाल या
किसकी हैवानियत को बयाँ करती है
क्यों इन दंगो की आग
सिर्फ मासूमों को ही
जला कर राख करती हैं ?

अंजु(अनु)

49 comments:

अभिषेक कुमार झा अभी said...

तुम्हारा दिया
सिंदूर फिसल गया''

आह्ह्ह दुखद संदेश का मार्मिक अंकन

खंड-खंड टूटता हुआ
आदमी
आदमी को ही कुचलता हुआ
आगे बढ़ता है''

अभिलाषित जीवन आज अभिषापित बन रहा है,
और हम सब समझ नहीं पा रहे हैं।

बहुत ख़ूब सामायिक घटनाक्रम पे आपकी लेखनी।

Anju (Anu) Chaudhary said...

शुक्रिया अभिषेक

ajay yadav said...

अत्यन्त मार्मिक किन्तु यथार्थ लेखन |
दंगो ने बहुत दुःख दिए हैं |
अभी तक मन गमगीन हैं |
.....हमसे तो अच्छे वे परिंदे हैं जो कभी मंदिर पर जा बैठे ,कभी मस्जिद पर |

Anju (Anu) Chaudhary said...

सही कह रहे हो अजय भाई

Manoj Kumar said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति बिलकुल यथार्थ,

Anju (Anu) Chaudhary said...

शुक्रिया मनोज जी

yashoda agrawal said...

आपने लिखा....
हमने पढ़ा....और लोग भी पढ़ें;
इसलिए बुधवार 11/09/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in ....पर लिंक की जाएगी. आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सुन्दर प्रस्तुति...!
--
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि का लिंक आज मंगलवार (10-09-2013) को मंगलवारीय चर्चा 1364 --गणेशचतुर्थी पर विशेषमें "मयंक का कोना" पर भी है!
सादर...!
आप सबको गणेशोत्सव की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Randhir Singh Suman said...

nice

Anita said...

बहुत मार्मिक रचना..

अरुन शर्मा अनन्त said...

नमस्कार आपकी यह रचना आज मंगलवार (09-09-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

दोनों रचनाएँ मन की वेदना को कहने में सक्षम हैं ..... गुलमोहर की लाली जहां मन को उल्लासित करती है वहीं धरती पर फैली लाली मन को क्षोभ से भर देती है ।

Mukesh Kumar Sinha said...

fisalta sindooor...
bahut sach...

Ranjana Verma said...

बहुत ही मार्मिक रचना......
सच ये दंगे बहुत व्यथित करते हैं

Alaknanda Singh said...

अंजू जी, सिंदूरों ने अभी कोई राजनैतिक पार्टी ज्‍वॉइन नहीं की है ना इसलिए फिसल रहा है....जिसदिन कर लेगा यकीन मानिये फिर वो किसी गली में खड़ा फिसलेगा नहीं..दंगों के दर्द की तरह चिपक जायेगा।

Alaknanda Singh said...

अभी सिंदूर का किसी पॉलिटकल पार्टी से एग्रीमेंट नहीं हुआ है ना इसलिए फिसल रहा है...

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

दंगो की ये मार ने,मिटा दिया सिन्दूर
जनता झेले ताप यह,राजा मद में चूर...

गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाए !

RECENT POST : समझ में आया बापू .

Pratibha Verma said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति। ।

वसुंधरा पाण्डेय said...

बेहद मार्मिक ...आह ! कुछ कहा न जाय...

अरुण चन्द्र रॉय said...

बहुत सुन्दर कविता। सिन्दूर का फिसलना बढ़िया विम्ब चुन है। आपकी अच्छी रचनाओं में से एक।

Anju (Anu) Chaudhary said...

शुक्रिया शास्त्री जी

Anju (Anu) Chaudhary said...

आभार यशोदा जी

Anju (Anu) Chaudhary said...

शुक्रिया अरुण

दिगम्बर नासवा said...

न जाने कितने सिन्दूर मिट जाते हैं इन दंगों की चपेट में ...
बहुत मार्मिक ... संवेदनशील रचना है ...

Pallavi saxena said...

क्यूंकि इन मासूमों कि चिताओं पर ही आजकल की गंदी राजनीति के गंदे नेताओं की रोटियाँ जो सिकती है। वाह!!!अनुपम भाव संयोजन बहुत बढ़िया लिखा है दंगो के सच को ब्यान करती रचना है अंजु जी...बहुत बढ़िया

Aziz Jaunpuri said...

बहुत उकता गया हूँ ज़िन्दगी से चले ज़गलों में कहीं एक घर बना लें,दंगों में ज़िन्दगियाँ बरबाद कर दिया है

Neelima sharma said...

सारे रंग
सारी रोशनियाँ,
सारे मौसम
और अंश-अंश तुम्हारा
बिखर गया
इन दंगो की मार में
मेरी मांग से ही क्यों
तुम्हारा दिया
सिंदूर फिसल गया ||.दिल को छु गये यह लफ्ज़ ............ और कोई नही सुन रहा सिसकिया न सिंदूर की न खिलोनो की

ताऊ रामपुरिया said...

दंगों की वेदना से मन में तीव्र विराग उत्पन्न होता है. बेकसूर लोग मारे जाते हैं. बहुत ही सटीक और सामयिक रचना.

रामराम.

Darshan jangra said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - बुधवार - 11/09/2013 को
आजादी पर आत्मचिन्तन - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः16 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra





Darshan jangra said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - बुधवार - 11/09/2013 को
आजादी पर आत्मचिन्तन - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः16 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra





डॉ. मोनिका शर्मा said...

मार्मिक और प्रासंगिक अभिव्यक्ति .... संवेदनशील भाव

राजीव कुमार झा said...

क्यों इन दंगो की आग
सिर्फ मासूमों को ही
जला कर राख करती हैं ?
बहुत मार्मिक.

Darshan jangra said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - बुधवार - 11/09/2013 को
आजादी पर आत्मचिन्तन - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः16 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra





Kaushal Lal said...

इन दंगो की मार में
मेरी मांग से ही क्यों
तुम्हारा दिया
सिंदूर फिसल गया.........बहुत मार्मिक.

कालीपद प्रसाद said...

इन दंगो की मार में
मेरी मांग से ही क्यों
तुम्हारा दिया
सिंदूर फिसल गया ---गहरी सोच ,मार्मिक सुन्दर रचना
latest post: यादें

Naveen Mani Tripathi said...

bahut hi marmik rachana Anu ji ........ye danga samajvadi party ki den hai .

सदा said...

सारे रंग
सारी रोशनियाँ,
सारे मौसम
और अंश-अंश तुम्हारा
बिखर गया
इन दंगो की मार में
मेरी मांग से ही क्यों
तुम्हारा दिया
सिंदूर फिसल गया
:( ये हालात भी कब क्‍या से क्‍या हो जाते हैं

इमरान अंसारी said...

बेहद मार्मिक |

कुशवंश said...

बेहतरीन अभिव्यक्तिया मार्मिक

Dr. Sarika Mukesh said...

दंगों के मर्म को बखूबी दर्शाती कविता हैं दोनों...
खंड-खंड टूटता हुआ
आदमी
आदमी को ही कुचलता हुआ
आगे बढ़ता है......
अंजू जी यह आज का भयावह सच है...
दिल को छू गई आपकी बात;-))

Maheshwari kaneri said...

बहुत सुन्दर और मार्मिक प्रस्तुति ..

sushma 'आहुति' said...

गहन अभिवयक्ति......

shorya Malik said...

दंगे एक ऐसा दर्द जो कभी ख़त्म नहीं होता

काजल कुमार Kajal Kumar said...

त्रासदी हमारी नि‍यति है :-(

Kailash Sharma said...

बहुत मार्मिक और सार्थक प्रस्तुति...

संजय भास्‍कर said...

क्यों इन दंगो की आग
सिर्फ मासूमों को ही
जला कर राख करती हैं ?
............ संवेदनशील भाव बहुत मार्मिक !!

नीरज पाल said...

आपकी इस रचना को सोमवारीय चर्चा(http://hindibloggerscaupala.blogspot.in/) में शामिल किया है, जरुर पधारें।

पूरण खण्डेलवाल said...

सुन्दर और सटीक प्रस्तुति !!

डॉ. जेन्नी शबनम said...

दोनों रचना बेहद मर्मस्पर्शी!