Tuesday, February 23, 2010

खामोशिया


तेरी खामोशिया बहुत कुछ ब्यान करती है
बंदिशे तेरी ..मुझे तक पहुँचती है
देके आवाज़ तुझे ..रोकने का मन करता है
पर क्या करूँ...तेरी भी कुछ मजबूरिया
मुझे हर बार रोकती है ...
बाँध दिए थे सब अरमां…
दूर किसी डाली से..
मेरे चेहरे से तेरे ग़म को जीया आज भी मैंने ,
मिलके जो हमने जलाया वो दोस्ती का दीया आज भी है.....
(...कृति....अंजु...अनु..)

5 comments:

ѕαηנαу ѕєη ѕαgαя said...

अनुराधा जी बहुत खूब रचना,पढने के बाद खामोश भी नहीं रहा जाता !!

anju choudhary..(anu) said...

dhanywad sanjay...

Pawan Jindal, General Secretary said...

aap bahut achha likhti ho anju ji
dil ko choo jata hai
aapki is kala ko salaam dost

अलीम आज़मी said...

behtareen likha hai aapne ...

सूर्यकान्त गुप्ता said...

"मिल के जो हमने जलाया वो दोस्ती का दीया आज भी है"भावों की सुन्दर अभिव्यक्ति……। आभार!