Thursday, May 13, 2010

मै जी लूंगी...मै जी लूंगी .......


मै जी लूंगी...मै जी लूंगी .......
अजीब है इस दिल की हसरते भी
पास हो कर भी दूरियाँ हैं कितनी
छुने का मन करता है
पर उसके खो जाने का भी डर
सताता हैं
बैठे है हम पास उनके इतना
मन की आवाज़ को भी वो छू सकते है
जब भी बोलने लगे लब मेरे
वो क्यों धुँया सा हो जाते है ?
एहसास मेरे
शब्दों की भाषा समझते है
सुनता है दिल धडकनों को अगर
वो दर्द की दवा मांगता सा क्यों है?
हमने तो लफ़्ज़ों में उतरा है हर दर्द को
पर तुमने तो दर्द को ही हिस्सों में बाँट दिया है
लो शब्द तुम ले लो
एहसास मुझे देदो
जीत का सहेरा तुम पहनो
अपनी हार का जश्न मै मना लूंगी
खुद में जीने की तमन्ना मै जगा लूंगी
मेरी खुशियाँ आई जो दरवाज़े पर
उस में भी तुम अपनी हिस्सेदारी ले लो
मै खाली पड़े दिल में ही
खुद से जश्न मना लूंगी

मै जी लूंगी.....मै जी लूंगी....
(अंजु ...चौधरी.....(अनु.)

2 comments:

संजय भास्कर said...

किस खूबसूरती से लिखा है आपने। मुँह से वाह निकल गया पढते ही।

संजय भास्कर said...

सूक्ष्म पर बेहद प्रभावशाली कविता...सुंदर अभिव्यक्ति..प्रस्तुति के लिए आभार जी