Saturday, June 18, 2011

प्रेम दीवानी



प्रेम दीवानी



सूरज की गरमी ,चन्दा की ठंडक
इसमें छिपे अनंत बसंत
अपनी बानी प्रेम की बानी
इसकी सियाई आँखों का पानी

जिसको ना घर समझे
ना समझे गली दीवानी
जिसकी हर अदा पर
मर गई ये
मीरा दीवानी ....

मै तो हूँ एक पिंजरे के मैना
जात अजानी ,नाम अनजाना
कहीं ना उसका ठौर ठिकाना ,
दिल है शोला ,आँखों में शबनम
कुछ चोट लगी बाहर थी
कुछ चोट लगी भीतर थी
शबनम की बूंदों तक पर
निर्दयी धूप की कड़ी नज़र थी
कोई था बदहाल धूप में
कोई था ग़मगीन छावं में
जिसको अपनाया उसकी
याद संजोई मन में ऐसे
जो दीवा जले तुलसी-पूजन में
आज भले ही तुम कुछ भी
कहें लो ....
मै उसकी हो गई जी
जो थाम के जिगर उठा ,
जो मिला के नज़र
इस प्रेम द्वारे झुका जी
--
((anu))
anu

41 comments:

दिलबागसिंह विर्क said...

जिसको अपनाया उसकी
याद संजोई मन में ऐसे
जो दीवा जले तुलसी-पूजन में
bahut khoob

यशवन्त माथुर (Yashwant Raj Bali Mathur) said...

बेहतरीन कविता है.

सादर

Anonymous said...

good

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

समर्पण की भावना को लेकर बहुत सुन्दर रचना!

DR. ANWER JAMAL said...

Nice post.
Wah ....

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

खूबसूरत एहसास ..सुन्दर प्रस्तुति

SAJAN.AAWARA said...

MAM BAHUT KHUBSURAT KAVITA LIKHI HAI APNE..
JAI HIND JAI BHARAT

Mahesh Barmate "Maahi" said...

nice poem Anu ji...

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

'प्रेम दीवानी'... बहुत सुन्दर...बधाई

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

याद संजोई मन में ऐसे
जो दीवा जले तुलसी-पूजन में

ये दो पंक्तियां गोपाल दास नीरज की याद दिला गयी।
सुंदर कविता है।
आभार

Vichar Kranti said...

मै तो हूँ एक पिंजरे के मैना
जात अजानी ,नाम अनजाना
कहीं ना उसका ठौर ठिकाना ,
दिल है शोला ,आँखों में शबनम
कुछ चोट लगी बाहर थी
कुछ चोट लगी भीतर थी

अनु जी

बहुत ही अच्छी कविता हे
आप का बहुत बहुत धन्यवाद!

निर्मला कपिला said...

कोई था बदहाल धूप में
कोई था ग़मगीन छावं में--- शायद इन्सान को किसी तरह चैन नही । लेकिन आपके समर्पण के लिये शुभकामनायें। सुन्दर रचना।

मदन शर्मा said...

बहुत सुन्दर एवं भावपूर्ण रचना ! मेरी बधाई स्वीकार करें !

दिगम्बर नासवा said...

खूबसूरत प्रेम के रंग में रची रचना ...

अरुण चन्द्र रॉय said...

प्रेम पर सदियों से लिखा जा रहा है... दीवानगी पर वर्षों लिखा गया है... लेकिन नदी की तरह जिस तरह यह कविता बह रही है प्रेम के प्रति पागलपन नए क्षितिज पर है... कविता एक सांस में पढ़ गया और यह दिल में उतर गई.... सुन्दर कविता...

हरीश भट्ट said...

रचना के भाव प्रत्यक्षतः निरूपित हैं.... पर यह अतिरंजित रूप हैं मीरा और राधा का युग बीत गया अब ..शाश्वत प्रणय केवल संभाषण और उत्कर्ण में ही प्रेरित करता हैं समर्पण हालाँकि साधिकार ही होता हैं पर समर्पण और अतिक्रमण को बहुत महीन रेखा विभाजित करती हैं
रचना अंतस की जद्द-ओ-जहद को बखूबी बयां करती हैं पर रवानगी में पशोपेश हैं की उलाहना हैं या समर्पण...शेष ..बहुत खूबसूरत लिखा हैं

vandan gupta said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (20-6-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

वाणी गीत said...

एक कृष्ण दीवानी मीरा , एक दीवानी इस कविता में
प्रेम को समर्पित खूबसूरत कविता !

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

prem mein doobi hui bhaavpoorn rachna anu ji...

मुकेश कुमार सिन्हा said...

khubshurat prem ka ahsaas dikha diya aapne:)

यशवन्त माथुर (Yashwant Raj Bali Mathur) said...

कल 21/06/2011को आपकी एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की गयी है-
आपके विचारों का स्वागत है .
धन्यवाद
नयी-पुरानी हलचल

Anamikaghatak said...

khubsurat rachana

मनोज कुमार said...

शबनम की बूंदों तक पर
निर्दयी धूप की कड़ी नज़र थी
कोई था बदहाल धूप में
कोई था ग़मगीन छावं में
आपकी कविता में कथ्य और संवेदना का सहकार है जिसका मकसद इस संसार को व्यवस्थित और प्रेममय देखने की आकांक्षा है।

नश्तरे एहसास ......... said...

bahut hi sunder aur bhaavpurna prastuti.badhai:)

Urmi said...

सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लाजवाब रचना लिखा है आपने ! बधाई!

ashish said...

प्रेम में समर्पण ,प्रेम की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति है . भाव प्रवण कविता .

CS Devendra K Sharma "Man without Brain" said...

आज भले ही तुम कुछ भी
कहें लो ....
मै उसकी हो गई जी
जो थाम के जिगर उठा ,
जो मिला के नज़र
इस प्रेम द्वारे झुका जी

bahut khoob!!!!

isse pichhli rachna ishq ki mulakaat bhi laajawaab hai...........

राजीव तनेजा said...

"जिसको अपनाया उसकी
याद संजोई मन में ऐसे
जो दीवा जले तुलसी-पूजन में"

बहुत बढ़िया...

Kunwar Kusumesh said...

beautifully written.

बी.एस.गुर्जर said...

सूरज की गरमी ,चन्दा की ठंडक
इसमें छिपे अनंत बसंत
अपनी बानी प्रेम की बानी
इसकी सियाई आँखों का पानी
क्या आज भी है ऐसी दीवानी.? ......आभार .... बहुत सुन्दर ...

रविकर said...

कुछ चोट लगी बाहर थी
कुछ चोट लगी भीतर थी

कुछ खोट रही थी अंतर में --
थपकाने से अब बेहतर है |

हूँ कुम्भकार की रचना मैं -
एह्सान सदा ही मुझ पर है ||

पर हक़ उसका सबसे ज्यादा -
जो दिल में है वो दिलवर है ||

Rajiv said...

"मै उसकी हो गई जी
जो थाम के जिगर उठा ,
जो मिला के नज़र
इस प्रेम द्वारे झुका जी"
बहुत बेहतरीन और सारगर्भित बात उभरकर आयी है.प्रेम की इन्तहा शायद यही है,यही हो.

कविता रावत said...

bahut khoobsurat prempagi rachna... sundar prastuti..shubhkamnayen!

Maheshwari kaneri said...

मै उसकी हो गई जी
जो थाम के जिगर उठा ,
जो मिला के नज़र
इस प्रेम द्वारे झुका जी... प्रेम में समर्पण का सुन्दर भाव और सुन्दर अभिव्यक्ति...
अनु जी आप मेरे ब्लांग में आई ..बहुत बहुत धन्यवाद..

Anju (Anu) Chaudhary said...

आप सभी मित्रो का मेरे ब्लॉग पर आने के लिए धन्यवाद
ऐसे ही अपने विचारो से मेरा हौंसला बढ़ाते रहे ...........आभार

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

सच. बहुत ही सुंदर भाव.. क्या बात है..

जो दीवा जले तुलसी-पूजन में
आज भले ही तुम कुछ भी
कहें लो ....
मै उसकी हो गई जी
जो थाम के जिगर उठा ,

सदा said...

मै उसकी हो गई जी
जो थाम के जिगर उठा ,
जो मिला के नज़र
इस प्रेम द्वारे झुका जी...
वाह ...बहुत खूब कहा है आपने ।

मुकेश कुमार सिन्हा said...

kya kahun, bahuto ne bahut kuchh kah diya..sach me kahin se prem bah raha hai....samajh me aa raha hai..:)

Anju (Anu) Chaudhary said...

mahendr ji...sada ji...mukhe ji aap sabka shukriya...ki aapne dil se meri kavita ko padha
bahut bahut aabhar

विवेक दुबे"निश्चल" said...

Mai ho gaai uski jo tham ke jigar uttha , jo mila ke najar is prem duar jhuka jhuka.
Bahut sundar waaaaah

Ansh said...

awsome poem......... dil ko chu gayi bua.........