Tuesday, July 26, 2011

जिन्दगी के कुछ अलग अलग रंग...


जिन्दगी के कुछ अलग अलग रंग...

१...
एक फूल की नियति देखो
बार बार
भौंरे आते है
पूरा रस निचौड़ कर
उड़ जाते है
एक दिन का यौवन
उस फूल का
अगले ही दिन वो
मुरझा के टूट
जाता है ...
फिर से खिल जाने को ....




एक मूर्तिकार
शिल्पकार ..
जन्मदाता एक
मूर्ति का
तराशा ...सजाया
अपने हाथो से
रंगों से प्राण फूंके
पर पेट की भूख
यहाँ भी भारी
खुद की कृति को
बिकवा के ही
ये भूख है मानी .............



विचारो की असमानता
धन की अधिकता
बदली हवा
नशे की लत
बहकता घर का मुखिया
सस्ते शराब से
भी रिश्ते
घर अपना ही
लुटा रहा
घर का ही भागीदार
मानवता का मुख
काला करता
समय बुरा
उसका नतीजा
इस जीवन से
हार कर पहुंचे ...
पारिवारिक विघटन तक ||

(अनु )

44 comments:

kumar said...

tinon rachnayen ek se badkar ek hain.....

bahut hi yatharth aur jeevant likha hai aapne....


aadar sahit

रश्मि प्रभा... said...

her kadam pukhta hai ... bahut hi gahan, behtareen

SAJAN.AAWARA said...

MAM BAHUT HI ACHU RACHNAYE HAI..... PAHLI OR TEESRI KUCH JYDA HI ACHI LAGI

SAJAN.AAWARA said...

ARE EK CHIJ TO BHUL HI GAYA.........

JAI HIND JAI BHARAT

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बेहतरीन।

---------
कल 27/07/2011 को आपकी एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

संजय भास्कर said...

आदरणीय अनु दी
नमस्कार !
गहन अभिव्यक्ति सभी क्षणिकाएं बहुत अच्छी लगीं......शुभकामनाएँ ।

Mukesh Kumar Sinha said...

khud ki kriti bikwa hi di usne...........!!
sach me ye to gaur karne wali baat thi na!
ek ubharti hui kaviyatri....:)

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

लबी शब्दचित्र सोचने को बाध्य करते हैं!
बहुत सुन्दर रचनाएँ लिखी हैं आपने!

संजीव said...

जिन्‍दगी के तीन अलग-अलग रंग किन्‍तु एक ही समाज के. फूल की नियति, मानवता में सृजन का अवमूल्‍यन और अवचेतन की ओर बढ़ता समाज.

रवीन्द्र प्रभात said...

सुन्दर और सारगर्भित !

"नेह्दूत" said...

Jo jeeta he kisi or ki khushio ke liye bow baar baar murjha kar khilta he har baar ek or naai khushi dene ke liye
murjha ka tutta he phir se kilne ko....
Adbhut har baar pahle se behtar ..

"नेह्दूत" said...

"Manavta ka mukh kala karta samay bura "
aaj ke samay ko ek dam sahi paribhashit kiya he aap ne

"नेह्दूत" said...

Shayd
yah Bhukh na hoti
to kuchh na hota
Bhukh hi to he jo
karati he sirjan har krti ka

राजीव तनेजा said...

जिन्दगी के अलग-अलग रंगों को बखूबी दर्शाती सुन्दर रचनाएँ

अरुण चन्द्र रॉय said...

तीनो कवितायेँ पठनीय ...दूसरी कविता इनमे बेहतर

अरुण कुमार झा said...

anu ji aapki rachna sirf wah-wahi ki seema tak hi nahi rahni chahiye, iska orchhor ko kisi ne aaj tak khoj hi nahi paya, aap apne bare men jitni imandari se bayan ki hain, main samjhta hoon ki ham sabi ki sath aisa hi hai, koi likhta hai, mahsoos karta hai, koi awayakt na kar duniya se vida ho jata hai, sab ka dard to ek hi hai, dil aur dimag ko ek bar sochne ko majboor karta hai ki akhir iska samadhan kya hai, aisa kyon hota hai........... anant hai...dukh ..anthin khoj,

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

ज़िंदगी के तीनों रंग बहुत खूबसूरती से उकेरे हैं ..सुन्दर प्रस्तुति

महेश बारमाटे "माही" said...

बहुत बढ़िया रचना अनु जी !
देरी के लिए क्षमा करें, आज कल थोड़ा व्यस्त हूँ...

अनुपमा त्रिपाठी... said...

BAHUT SUNDER ..GAHAN ..RACHNAYEN...man par chap si gayin .....

Shrikaant said...

beautiful, very intense poetry,nicely presented and packaged.anu has a remarkable understanding of human nature and events.

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

teeno muktak bahut hee khoobsoorat hain anu jee!

amrendra "amar" said...

aapne bakhubi ukera hai jindagi ke falsafe ko.
badhai......................

नीरज गोस्वामी said...

तीनो रचनाएँ अलग अलग कहानियां बयां कर रही हैं...आपका लेखन विलक्षण है...बधाई स्वीकारें

नीरज

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल कल 28 - 07- 2011 को यहाँ भी है

नयी पुरानी हल चल में आज- खामोशी भी कह देती है सारी बातें -

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') said...

अनु जी, बहुत ही प्‍यारे रंग संजोए हैं आपने।

बधाई।

.......
प्रेम एक दलदल है..
’चोंच में आकाश’ समा लेने की जिद।

Apanatva said...

bahut paripakv soch kee dhanee hai aap.......ye lekhan ujagar kar raha hai......
Aabhar

Babli said...

सभी रचनाएँ बहुत सुन्दर है! गहरे भाव के साथ शानदार प्रस्तुती! आपकी लेखनी को सलाम!

Maheshwari kaneri said...

सभी क्षणिकाएं गहन अभिव्यक्ति लिए हुए है.सुन्दर प्रस्तुति.. बहुत अच्छी लगीं..

राकेश कौशिक said...

जीवन के विभिन्न रंगों की प्रभावशाली प्रस्तुति

Minakshi Pant said...

बहुत ही खूबसूरती से सबके एहसास को ब्यान करने का खूबसूरत अंदाज़ बहुत अच्छा लगा दोस्त जी :)

Sawai Singh Rajpurohit said...

very very nice post.

S.M.HABIB said...

तीनों क्षणिकाएं अद्भुत हैं....
सादर...

Dorothy said...

दिल की गहराईयों को छूने वाली बेहद खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
सादर,
डोरोथी.

Dimple Maheshwari said...

aap bahut achha likhti hain anjuji..ek ek sahbd bahut kuchh kaha rha...

Udan Tashtari said...

क्या बात है...तीनों ही बेहतरीन....

नीरज जाट said...

बहुत बढिया प्रस्तुति

ZEAL said...

विचारो की असमानता
धन की अधिकता
बदली हवा
नशे की लत
बहकता घर का मुखिया
सस्ते शराब से
भी रिश्ते
घर अपना ही
लुटा रहा
घर का ही भागीदार ....

Beautifully expressed with all the accurate reasons. Hope people will realize the worth of a beautiful and loving joint family .

.

vidhya said...

बेहतरीन।

નીતા કોટેચા said...

bahutttttttttt hi badhiya... gr888 annu..kitni gahan bate..

दिगम्बर नासवा said...

तीनों रचनाओं में अलग अलग मानसिकता को दर्शाया है ... अध्बुध लिखा है ...

Dilbag Virk said...

आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें
चर्चा मंच

ASHOK ARORA said...

१.एक फूल की नियति देखो.. आप के शब्द हमारे लिए कुछ कहने की जगह ही नहीं छोड़ते ... मुरझा कर टूट जाना और फिर खिलना ही फूल की नियति है ........अनु जी......क्या कहा हूँ आप के लिए...अति.सुंदर

२. ये भूख क्या क्या न करवा दे ...जन्म दाता ही खुद ..अपनी मूर्ति..का दुश्मन बन जाता है ..ये हर युग की कहानी है ..बस सब्द आपके ..अति..उत्तम..प्रस्तुती

३. ये रचना आज के समाज पर...बहुत कुछ कह जाती है...धन की अधिकता..नशे की लत.....घर अपना ही
लुटा रहा..घर का ही भागीदार ........आप कैसे ऐसा सोच लेती है.....बधाई की पात्र हैं..अनु

निर्मला कपिला said...

तीनो रचनायें एक से बढ कर एक है। शुभकामनायें।

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

तीनों रचनाएं भावपूर्ण........
कथ्य स्वतः प्रकट हो रहा है .....मन को झकझोरने में समर्थ