Thursday, June 21, 2012

क्षितिजा

क्षितिजा

तुम कहते हो
निकलता हुआ चाँद
मुझे ही ताकता है
पर हर सांझ वो
मुझे बहुत रुलाता है
जब तुम से बिछड़ कर
जाने का वक़्त करीब
आता है ..
तुम से बिछड़ने से पहले
मैं खुद में विस्तार पाती हूँ
कनपटियों पर बजती हैं
खड़-खड़ उसाँस तुम्हारी
और
तुम्हारी ही हँसी के
चाँदी जैसे कण
बिखरने लगते है
मेरे चारो ओर
यह खंड-खंड टूटता हुआ सूरज
 और फटता हुआ मेरा मासूम ह्रदय
किसी तरह भी
रोक नहीं पाता
क्यों.. 
बंधी मुट्ठियों से फिसलती है
हर दिन की आखिरी किरण
दे जाने को एक नई
सांझ जीवन की
उठती हुई ...क्षितिजा को ||

अनु

39 comments:

expression said...

बहुत सुन्दर अंजू जी....
प्यारी सी रचना...


अनु

bhawna vardan said...

bahut hi bhavpoorn abhivyakti hai....

Maheshwari kaneri said...

एक प्यारी सी सुन्दर रचना...

sushila said...

बहुत भावपूर्ण और सुंदर अभिव्यक्‍ति! बधाई!

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

बहुत सुंदर रचना
क्या बात है



बंधी मुट्ठियों से फिसलती है
हर दिन की आखिरी किरण
दे जाने को एक नई
सांझ जीवन की
उठती हुई ...क्षितिजा को ||

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत खूबसूरती से उकेरे हैं भाव ....

poonam said...

bhetreen

Reena Maurya said...

सुन्दर भावों से सजी
बहुत ही सुन्दर , बेहतरीन रचना...
:-)

Reena Maurya said...

सुन्दर भावों से सजी
बहुत ही सुन्दर , बेहतरीन रचना...
:-)

संध्या शर्मा said...

क्षितिजा पा लेती हर दिन की आखिरी किरण से एक नई सांझ जीवन की... बहुत सुन्दर रचना

dheerendra said...

बंधी मुट्ठियों से फिसलती है
हर दिन की आखिरी किरण
दे जाने को एक नई
सांझ जीवन की
उठती हुई ...क्षितिजा को ||

बहुत सुंदर रचना,,,,,

RECENT POST ,,,,फुहार....: न जाने क्यों,

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

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केवल राम : said...

बेहतर रचना ...!

रश्मि प्रभा... said...

तुम्हारी ही हँसी के
चाँदी जैसे कण
बिखरने लगते है
मेरे चारो ओर
यह खंड-खंड टूटता हुआ सूरज
और फटता हुआ मेरा मासूम ह्रदय
मिलन और विरह के कतरे बहुत हो गए ...

दर्शन कौर धनोय said...

तुम कहते हो
निकलता हुआ चाँद
मुझे ही ताकता है
पर हर सांझ वो
मुझे बहुत रुलाता है
जब तुम से बिछड़ कर
जाने का वक़्त करीब
आता है .."
बहुत सुन्दर अंजू...

Vinamra said...

'क्षितिजा' शीर्षक बहुत पसंद आया. कविता भी उतनी ही सुन्दर.

amrendra "amar" said...

bhavpurn panktiyon ke liye badhai di

Anita said...

तुम्हारी ही हँसी के
चाँदी जैसे कण
बिखरने लगते है
मेरे चारो ओर
यह खंड-खंड टूटता हुआ सूरज
और फटता हुआ मेरा मासूम ह्रदय

बहुत मासूम सी कविता...सुंदर भाव !

सदा said...

भावमय करते शब्‍दों का संगम ... उत्‍कृष्‍ट अभिव्‍यक्ति

Amrita Tanmay said...

वाकई...क्षितिजा उठती हुई..सुन्दर रचना.. अंजू जी.

वन्दना said...

बहुत सुन्दर भाव संयोजन

Kailash Sharma said...

बंधी मुट्ठियों से फिसलती है
हर दिन की आखिरी किरण
दे जाने को एक नई
सांझ जीवन की

....बहुत भावपूर्ण कोमल अहसास...सुन्दर रचना ...

संजय भास्कर said...

बंधी मुट्ठियों से फिसलती है हर दिन की आखिरी किरण दे जाने को एक नई सांझ जीवन की उठती हुई ...क्षितिजा को ||
..........सुंदर भाव बेहतरीन रचना

दिगम्बर नासवा said...

ये जीवन भी तो ऐसे ही चलता रहता है ...
गहरे भाव लिए रचना ...

ताऊ रामपुरिया said...

अत्यंत सशक्त भाव लिये एक सुंदर रचना, शुभकामनाएं.

रामराम.

Devendra Gautam said...

बंधी मुट्ठियों से फिसलती है
हर दिन की आखिरी किरण
दे जाने को एक नई
सांझ जीवन की
उठती हुई ...क्षितिजा को ||

ह्रदय की संवेदना को जगाती यह भावपूर्ण कविता...अच्छी लगी...बधाई

M VERMA said...

बंधी मुट्ठियों से फिसलती है
हर दिन की आखिरी किरण

सुन्दर भाव सुन्दर बिम्ब

S.N SHUKLA said...

सुन्दर सृजन , बधाई.

कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारकर अपना स्नेह प्रदान करें, आभारी होऊंगा .

Udan Tashtari said...

कनपटियों पर बजती हैं
खड़-खड़ उसाँस तुम्हारी

-क्या बात है!!

अमित श्रीवास्तव said...

आपकी प्रकृति 'प्रकृति' के बेहद करीब है |

सतीश सक्सेना said...

सुंदर रचना , बधाई अनु !

Rakesh Kumar said...

अनुपम भावमय प्रस्तुति.
दिलकश चित्र.

Shanti Garg said...

बहुत बेहतरीन रचना....
मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

babanpandey said...

natural living is being disturbed theses days... beautiful expression Anu jee..

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

खुबसूरत रचना....
सादर बधाई.

Ramakant Singh said...

बंधी मुट्ठियों से फिसलती है
हर दिन की आखिरी किरण

जुदाई बड़ी बेरहम होती है .

शिवनाथ कुमार said...

पर हर सांझ वो
मुझे बहुत रुलाता है
जब तुम से बिछड़ कर
जाने का वक़्त करीब
आता है ..

सुंदर ...
मिलन की ख़ुशी और विरह की पीड़ा सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है आपने ....

Anju (Anu) Chaudhary said...

email se mila comment



प्रिय अनु जी

सादर नमन

आपकी हर पोस्ट सदैव अच्छी लगती हैं परंतु अक्सर प्रतिक्रिया रह जाती है! आपको इस पुनीत कार्य हेतु साधुवाद! आप स्वस्थ और सानंद रहें तथा यह यात्रा यूँ ही अनवरत चलती रहे, यही कामना है!अपना स्नेह और लेखन में गतिशीलता बनाए रखें!

हार्दिक धन्यवाद!

सादर/सप्रेम

सारिका मुकेश

ब्लॉग: http://sarikamukesh.blogspot.in/

Anju (Anu) Chaudhary said...

रिय अनु जी

सादर नमन

............

बंधी मुट्ठियों से फिसलती है

हर दिन की आखिरी किरण

दे जाने को एक नई

सांझ जीवन की

उठती हुई ...क्षितिजा को ||

बहुत ही सुंदर पंक्तियाँ, आभार! लेखन में यूँ ही गतिशीलता बनाए रखें!

हार्दिक धन्यवाद!

सादर/सप्रेम

सारिका मुकेश

ब्लॉग: http://sarikamukesh.blogspot.in/