Sunday, December 16, 2012

मेरी सोच की डायरी के पन्ने


 सालों पहले डायरी लिखने का दिल किया तो,एक डायरी हाथ में आते ही मैंने लिखनी शुरू कर दी| डायरी में लिखी अपने दिन-प्रतिदिन की सोच को आप सबके साथ साँझा करने का मन किया तो आज उसी का ये पहला पन्ना आप सबके सामने लेकर आई हूँ |





पहला  पन्ना!

मैं रोए जाती हूँ, ये सोंचे बिना कि मैं क्यों रों रही हूँ, अपने लिए या अपने उन रिश्तो  के लिए जो मैंने बडी मेहनत से बनाए थे |बहुत बार सोचती हूँ कि  मैं ऐसी क्यों हूँ ? दिल से क्यों सोचती हूँ ? औरों जैसी क्यों नहीं हूँ, बात हुई बात खत्म, हर बात को दिल पर लेने की आदत क्यों पड़ गई है ? सोचती हूँ आज से मैं खुद से और अपने अंदर के भावुक ख्याल को अलग रख, बिना भावनाओं के जीने की कोशिश करुँगी,पर मुझे नहीं लगता कि मैं इस में कामयाब हो पाऊँगी  | जिंदगी मेरी,ख्याब मेरे, भले ही अधूरे हैं जो कभी अपने नहीं हुए फिर भी मेरे हैं और ये जिंदगी मेरे लिए एक ठग से बढ़ कर कुछ नहीं है  | मेरी सोच मुझ से शुरू होकर मुझ तक ही खत्म हो रही थी ठीक वैसे ही जैसे एक बूढी औरत के पास एक मुर्गा था और वो ये सोचती थी कि उसका जब मुर्गा बांग देगा तभी सुबह होगी,इसी वजह से वो पूरे गाँव भर में अकड़ कर चलती थी कि उसके मुर्गे की बांग के बिना सुबह ही नहीं होगी जबकि वो इस बात को नहीं समझ रही थी कि 'सुबह होती है तभी मुर्गा बांग देता है' ये ही सोच सोच का फर्क है, जिस बात को मैं सही मानती हूँ वही बात मेरे सामने वाले के लिए गलत भी हो सकती है ये सोंचे बिना मैंने कैसे अपनी सोच को उस पर थोप सकती हूँ |मैं कुछ समय के लिए ये भूल गई थी कि मेरे बिना भी जिंदगी चलेगी,भले ही कुछ देर थमने के बाद हर काम वैसे ही होगा जैसे मेरे होते हुए हुआ करता है  | ठीक वैसे ही,जब एक रेलगाड़ी पटरी से उतर जाती है तो उसके पीछे आती हुई रेलगाडियों को समय पर चलने के लिए कुछ वक्त लगता है, और वो कुछ वक्त के बाद उसी पटरी से अपने  निश्चित स्थान पर पहुँचनी शुरू हो जाती हैं, ऐसा ही कुछ हाले-बयाँ  हर किसी की जिंदगी का भी है |आज पहली बार मैंने, मेरे मन के भीतर झाँका और देखी अपनी धारणाएँ,अपने पक्षपात,अपने विचार और अपने ही सिद्धांत जिन पर चल कर मैंने अब तक का सफर तय किया है, फिर ऐसा क्यों लग रहा है कि अब भी सफर अधूरा है, कुछ है जीवन में जिस की कमी अब भी खटकती है इस दिल को |मैं बैठी हूँ, लोग आते हैं  बाते करते हैं और चले जाते हैं और मैं यूँ ही बैठी रह जाती हूँ क्यों मेरे भीतर  अब भी चिंताएँ,फिक्रें और बेचैनियाँ हैं उन सब के लिए जिन्हें मैं अपना मानती हूँ और वो मेरे लिए, मेरे बारे में क्या सोचते हैं इसकी चिंता किए बिना एक मुस्कान के साथ इस जिंदगी का एक नया दिन जीने के लिए खुद को ऊर्जित करती हूँ ,एक नई लड़ाई, कुछ खट्टी-मीठी बातें और ढेरों नई सोच के साथ मेरा नया दिन शुरू होता है और शुरू होता है एक नए चेहरे की नई सोच, एक भ्रांति, उस मन दर्पण के साथ जिसके सामने मैं खड़ी हूँ अपना चेहरा लिए,कुछ नए अनुभवों के लिए |

अंजु (अनु)

54 comments:

अरूण साथी said...

भावनाओं के बिना जीना? आप जैसों के लिए सम्भव ही नहीं, बढ़िया प्रयास, आगे का इंतजार..

Amrita Tanmay said...

इसी तरह हर सुबह पहला पन्ना ही खुलता है बशर्ते हम भी वैसा ही पढ़ना चाहें..

ASHOK ARORA said...

जीवन इसी का नाम है...कदम रुकने नहीँ चाहियेँ...बहुत खुबसुरती कह दी आप ने अपने दिल की बात..."मैं बैठी हूँ, लोग आते हैं बाते करते हैं और चले जाते हैं और मैं यूँ ही बैठी रह जाती हूँ क्यों मेरे भीतर अब भी चिंताएँ,फिक्रें और बेचैनियाँ हैं उन सब के लिए जिन्हें मैं अपना मानती हूँ और वो मेरे लिए, मेरे बारे में क्या सोचते हैं इसकी चिंता किए बिना एक मुस्कान के साथ इस जिंदगी का एक नया दिन जीने के लिए खुद को ऊर्जित करती हूँ ,एक नई लड़ाई, कुछ खट्टी-मीठी बातें और ढेरों नई सोच के साथ मेरा नया दिन शुरू होता है और शुरू होता है एक नए चेहरे की नई सोच, एक भ्रांति, उस मन दर्पण के साथ जिसके सामने मैं खड़ी हूँ अपना चेहरा लिए,कुछ नए अनुभवों के लिए |"

..बस यूँही चलते रहे..कामयाबी...आप के कदम ..चूमने को तैयार खड़ी है.....
अंजु...:)
...अशोक अरोरा....

ASHOK ARORA said...

जीवन इसी का नाम है...कदम रुकने नहीँ चाहियेँ...बहुत खुबसुरती कह दी आप ने अपने दिल की बात..."मैं बैठी हूँ, लोग आते हैं बाते करते हैं और चले जाते हैं और मैं यूँ ही बैठी रह जाती हूँ क्यों मेरे भीतर अब भी चिंताएँ,फिक्रें और बेचैनियाँ हैं उन सब के लिए जिन्हें मैं अपना मानती हूँ और वो मेरे लिए, मेरे बारे में क्या सोचते हैं इसकी चिंता किए बिना एक मुस्कान के साथ इस जिंदगी का एक नया दिन जीने के लिए खुद को ऊर्जित करती हूँ ,एक नई लड़ाई, कुछ खट्टी-मीठी बातें और ढेरों नई सोच के साथ मेरा नया दिन शुरू होता है और शुरू होता है एक नए चेहरे की नई सोच, एक भ्रांति, उस मन दर्पण के साथ जिसके सामने मैं खड़ी हूँ अपना चेहरा लिए,कुछ नए अनुभवों के लिए |"

..बस यूँही चलते रहे..कामयाबी...आप के कदम ..चूमने को तैयार खड़ी है.....
अंजु...:)
...अशोक अरोरा....

vandana gupta said...

नज़रिया बदलने से ही नज़ारे बदला करते हैं।

Archana said...

ये तो मेरी डायरी का पन्ना लगा....पढूँ..?

shaveta said...

bahut hi ache anju di

madhu singh said...

लेखनी का बदला रुख, बहुत खुबसुरत .. एक नई लड़ाई, कुछ खट्टी-मीठी बातें और ढेरों नई सोच के साथ मेरा नया दिन शुरू होता है और शुरू होता है एक नए चेहरे की नई सोच, एक भ्रांति, उस मन दर्पण के साथ जिसके सामने मैं खड़ी हूँ अपना चेहरा लिए,कुछ नए अनुभवों के लिए |

yashoda agrawal said...

डायरी का पन्ना
और वो भी पहला
एक लम्बा सा लेखन
कुछ शिकायतें..उलाहनाएँ
कुछ चाहतें..और अपेक्षाएँ
आत्म-स्वीकृति...
और लेखन के बाद
प्राप्त संतोष
और मन का हलकापन
अब बस नहीं लिखा जा रहा
अस्तु

Anju (Anu) Chaudhary said...

अर्चना दीदी ....अभी आप आगे और भी पढ़ेंगी :)

सुज्ञ said...

विचारों की सुंदर संयोजना पहले ही पन्ने में

Anju (Anu) Chaudhary said...

shukriya yashoda ji

Archana said...

ह्म्म्म...

काजल कुमार Kajal Kumar said...

डायरी लि‍खन बहुत ख़तरनाक लगता है, कई बार बीती हुई नकारात्‍मक बातें दुखी करने लगती हैं

सुनील अनुरागी said...

दिल की बात सबीके साथ शेयर करने से मन को शांति भी मिलती है

Amit Srivastava said...

अपनी लिखी पंक्तियाँ अक्सर स्वयं को संबल देती हैं |

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

डायरी में लिखी पुरानी बातें कभी सकून देती है तो कभी मन को दुख पहुचाती है,,,

बहुत उम्दा अभिव्यक्ति ,,,, बधाई।

recent post हमको रखवालो ने लूटा

નીતા કોટેચા said...

उमीदो के शहर में जाना होता है जब जब ,
बेबसी ,उदासी और आसू ओ के अलावा कुछ न मिला .
भरे बाज़ार में बिका मेरा प्यार ,
बदले में बदनामी के सिवा कुछ ना मिला।

नीता कोटेचा "नित्या

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

बहुत ख़ूब!
आपकी यह सुन्दर प्रविष्टि कल दिनांक 17-12-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-1082 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

बहुत ख़ूब!
आपकी यह सुन्दर प्रविष्टि कल दिनांक 17-12-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-1082 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

Vaneet Nagpal said...

मन की व्यथा को शब्दों में बयाँ करना काफी मुश्किल होता है, बयाँ करने के बाद दूसरों से शेयर करना उससे भी मुश्किल | बहुत अच्छे ढंग से बयाँ किया है |

टिप्स हिंदी में पर नई पोस्ट : पैराग्राफ सेटिंग के 10 तरीके उदाहरण

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

किसी के होने या नहोने से फर्क तो ज़रूर पड़ता है पर फिर ज़िंदगी चलने लगती है ... रेलगाड़ी की तरह सबको अपने गंतव्य तक पहुँचना ही है .... अंतर है तो यह कि रेलगाड़ी रोज़ नया फेरा लगाती है जबकि ज़िंदगी की गाड़ी ही खत्म हो जाती है ...

Kavita Verma said...

dairy ke pahle hi panne me bhavnao ka sundar sanyojan..

उपासना सियाग said...

बहुत सुन्दर विचारों का तारतम्य ........

उपासना सियाग said...

बहुत सुन्दर विचारों का तारतम्य ......

ranjana bhatia said...

bahut hi bahdiya laga yah dyarai ka panna ..

वाणी गीत said...

मुर्गा बांग नहीं देगा तो क्या सुबह नहीं होगी ...हम ऐसे ही मगालते में रह जाते हैं , मगर जीवन में सबका अपना नजरिया , यदि इस तरह सोचा जाए तो सब सकारात्मक हो जाता है !
दिल से लिखी गयी इबारतें सीधे दिल तक जाती हैं !

ranjana bhatia said...

बहुत अच्छे लगे आपके यह डायरी के पन्ने

Maheshwari kaneri said...

अपनी ही लिखी बाते अकसर खुद को समय आन्र पर हिम्मत देती हैं..बहुत सुन्दर ..

Noopur Kothari said...

Dayri ka khubsoorat pehla panna...dusre panne ka intezar rahega... :)

http://apparitionofmine.blogspot.in/

दिगम्बर नासवा said...

संवेदनशील मन के विचार ...
जीवन यूं ही चलता रहता है ... कुछ यादें पड़ाव की तरह आती हैं रह जाती हैं दिल में ...

Kailash Sharma said...

यही ज़िंदगी है...रोज नए संघर्ष, रोज नए अनुभव और फिर आगे चलते जाना..

सुशील कुमार said...

Good

Aruna Kapoor said...

....बहुत अच्छा लिखा है आपने!...अपनी सोच को मन से बाहर निकालने का यह एक सुन्दर मार्ग है!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

अपनी पुस्तक में करो, भावनाओं को व्यक्त।
कोरे कागज को भरो, हो करके अनुरक्त।।

संध्या शर्मा said...

बहुत अच्छा लिखा है आपने, डायरी के इन पन्नो में हम उन बीते पलों को फिर से जी लेते हैं, कुछ खट्टी - मीठी यादें जीवंत हो उठती है, जैसे अभी-अभी की बात हो ... शुभकामनायें

Neelima said...

padh rahi hu apne unlikhe unkahe zazbaato ko .waiting for more pages

Shanti Purohit said...

bahut acha laga ye dayari ka pana

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

बहुत बढिया, डायरी लिखना आसान नहीं है..
मन को छूने वाली है ये डायरी, जारी रखिए

Mukesh Kumar Sinha said...

kya aap aisee hain???

Saras said...

जीवन में कई बार हम हैसे लम्हों से रूबरू होते हैं ...जब मन अशांत रहता है ...सब कुछ होते हुए भी कोई कमी होती है जिसे हम समझ नहीं पाते ....कुछ ऐसा जो हम चाहते हो ..लेकिन क्या... यह हम भी नहीं जानते ...एक वितृष्णा ..एक झुंझलाहट बनी रहती है ...ऐसे में सबसे अच्छी दोस्त होती यह डायरी ...आपने बहुत अच्छा किया इसे अपना हमदर्द बना लिया ...अच्छी शुरुआत ...:)

इमरान अंसारी said...

नया प्रयास...सराहनीय।

मन के - मनके said...

डायरी लिखना खुद के शीशे में खुद को झांकने जैसा है.
आपका प्रयास अच्छा रहा,ईमानदारी के साथ निभाया.

मन के - मनके said...

डायरी लिखना खुद के शीशे में खुद को झांकने जैसा है.
आपका प्रयास अच्छा रहा,ईमानदारी के साथ निभाया.

मन के - मनके said...

अतीत की गर्म चादर में सिमटा हुआ वज़ूद.

मन के - मनके said...

अतीत की गर्म चादर में सिमटा हुआ वज़ूद.

sushma 'आहुति' said...

apna sa dayari ka ye pahla panna....

Mamta Bajpai said...

जो बातें हम किसी से नहीं कह सकते .उन्हें पन्नों पर उतर कर मन हल्का कर लेते हैं
एसा ही होता है मन

Anita said...

बहुत अच्छा लगा पढ़ना आपकी डायरी का यह पहला पन्ना...आभार!

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

डायरी में लिखी पुरानी बातें कभी सकून देती है तो कभी मन को दुख पहुचाती है,,,

बहुत उम्दा अभिव्यक्ति ,,,, बधाई।

recent post: वजूद,

Ankur Jain said...

सुंदर..डायरी का पन्ना अच्छा लगा।।।

Dr.vandana singh said...

सुकोमल और भावपूर्ण....

निर्झर'नीर said...

ऐसा ही कुछ हाले-बयाँ हर किसी की जिंदगी का भी है
अच्छा लगा आपकी डायरी का पहला पन्ना..शुभकामनायें

निर्झर'नीर said...

ऐसा ही कुछ हाले-बयाँ हर किसी की जिंदगी का भी है
अच्छा लगा आपकी डायरी का पहला पन्ना..शुभकामनायें