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Tuesday, April 29, 2014

उसकी आखिरी रात में



उसकी आखिरी रात में 
साँसों का चलना 
और 
साँसों का रुकना 
इसी के बीच 
रुक-रुक के चलती जिंदगी 

पर वो 
जिंदगी की आखिरी रात 
सो कर नहीं बिताना चाहती 

वो भूल जाना चाहती है  
कि 
वो एक औरत है 
एक स्त्री, एक माँ है 
एक बेटी और एक बहन है 
किसी के घर की  
वो  खुद के लिए एक संसार 
रचना चाहती है 

उसके आँसू, उसकी हँसी
और उसके दर्द की परछाई
जिस में छिपी है उसकी जिंदगी की सच्चाई 
जिस से वो   
बाहर निकलना चाहती है 
जो फर्ज़ और दायित्व के नाम पर 
उसकी पीठ पर लाद दी गयी है 

वो पत्थर तोड़ती,
किसी के घर के धोती बर्तन 
या मजदूरी की कीमत पर 
अस्मत पर वार सहती 
जिसको हर किसी ने कम समझा 
कम ही आँका 

फिर भी वो अपनी 
पथरीली और काँटों की 
राहों को त्याग 
खुद के लिए 
मखमली राह का  
निर्माण करना चाहती है  

अपनी आखिरी रात 
अपने ही अंदर आँसुओं को ओढ़ कर 
नहीं सो जाना चाहती 

एक आत्मविश्वास सी परिपूर्ण 
नए समाज का निर्माण कर  
वो तो नवजात शिशु सी किलकारी के साथ 
विदा लेना चाहती है  

उसे अपने 
विस्तार के लिए 
किसी समुंदर की जरूरत नहीं  
उसकी उन्मुक्त उड़ान ही 
उसकी उपस्थिति है इस जाहन में 

है अब 
उसका खुद का आकाश,
खुद का विस्तार
खुद की जिंदगी की 
आखिरी सांस  
उसकी आखिरी रात में |

अंजु चौधरी (अनु)