Thursday, August 8, 2013

खूबसूरती, बलात्कार और तेजाब से पीड़ित लड़कियाँ



 क्या कसूर ऐसी बच्चियों का

कितनी अजीब बात है ना ...एक लड़की पैदा होती है ..उसे स्कूल में शिक्षा जैसी भी मिली हो पर उसे शादी के बाद  अपने ससुराल में तालमेल कैसे  बिठान है,समाज में कैसे बर्ताब करना है ...बाहर निकल कर लड़को से कैसे बात करनी है ...उनसे कितनी दूरी बनानी है ये बात उसकी माँ  वक्त वक्त पर समझाती रहती है|

पर  मेरा आज का लेख इस पर आधारित नहीं है |मैं तो आज दूसरा ही मुद्दा लेकर आई हूँ और वो मुद्दा हैं ''खूबसूरती,बलात्कार और तेजाब से पीड़ित लड़कियाँ ''| कितना दर्द सिमटा है सिर्फ इस वाक्य में |
जितना आसान लिखना है उतना ही मुश्किल उन बच्चियों के बारे में सोचना है जो इस वक्त इस तरह का जीवन जीने को मजबूर हैं |
क्या खूबसूरती खुद का गुरुर बन कर तख्तो-ताज पलट कर रख देती है ?
नहीं! आज का वक्त ऐसा नहीं है ..आज की खूबसूरती ऐसे मनचलों को दावत देती है जो उनसे उटपटांग हरकते करते हुए उनके जीवन में परेशानी पैदा करते हैं .. मुझे ऐसा लगता है कि ....आज की खूबसूरती तख़्त को तो नहीं पलटती ..पर स्त्री (स्त्रियों) की जिंदगी में ग्रहण जरुर लगा देती है |

सब  कहते हैं की मन की सुंदरता ...तन की खूबसूरती से कहीं ज्यादा साफ़-पाक होती है |पर कोई भी बाहरी  इंसान पहली मुलाकात में मन की सुंदरता नहीं देखता वो सिर्फ और सिर्फ सबसे पहले तन की सुंदरता की ओर ही आकर्षित होता है |
किसी  भी तेजाब केस को उठा कर देख लीजिए ...स्त्री या लड़की की अति-सुंदरता उसकी दर्द की इन्तहां और जीवन का विनाशक ही बनी है |आज भी (७.८.०१३ )प्रभात खबर.com पर जब ये खबर पढ़ी तो.....
(मुंबई : पश्चिमी उपनगर बांद्रा टर्मिनल पर जिस प्रीति राठी नामक लड़की पर तेजाब फेंका गया था उसकी मृत्यु के बाद उसके पिता अमर सिंह राठी ने केंद्रीय जांच ब्यूरो से मामले की जांच कराने के लिए बंबई हाइकोर्ट में याचिका दाखिल की. उन्होंने अपनी याचिका में अदालत को बताया कि शहर पुलिस ने इस मामले में कोई संतोष जनक प्रगति नहीं की है और न ही वह आरोपी अभी तक गिरफ्तार किया जा सका इसलिए इस मामले को सीबीआइ को सौंप दिया जाये.)
  बस ये ही सबसे पहले दिमाग में आया कि एक और खूबसूरती तेज़ाब की बलि चढ़ गई |

जिस बच्ची पर तेजाब फेंका गया वो निहायत खूबसूरत थी ...और तेज़ाब फेंकने के बाद उसकी मृत्यु हो गई |
इसका  मतलब ये ही हुआ की आज स्त्री के लिए उसकी खूबसूरती वरदान नहीं एक अभिशाप बन कर उभार रही है |
 कहीं ना कहीं खूबसूरती पर कोई ना कोई अटैक होता आया है ये हम सब जानते हैं |रेप,सारे आम अपहरण या ऐसी कोई भी हरकत जो समाज में  मान्य नहीं है ...खूबसूरत बच्ची या स्त्री को भुगतनी पड़ रही है |

पर मैं पूरी तरह से ये भी नहीं कह सकती ही सिर्फ और सिर्फ ऐसा खूबसूरत लड़कियों या स्त्रियों के साथ हो रहा है ...इस से मिलती जुलती खबरे भी हम रोज़ ही अख़बारों में या इस नेट की दुनिता के ऑन लाइन अखबार में पढ़ते ही रहते हैं ....जैसे कि ....मिलती जुलती खबरे(जागरण .......www.jagran.com........28 july 2013)

इस मुद्दे पर, अब कम से कम इस बात की तसल्ली है कि........उच्चतम न्यायालय द्वारा एसिड अपराधों के संदर्भ में...कड़े कानून लागूं किये हैं कि  एसिड की बिक्री अब बिना वैध लायसेंस के नहीं की जा सकेगी। इसका उल्लंघन करने पर...जुर्माना और तीन माह का कारावास होगा।( वैसे इस से ज्यादा कुछ होगा ...ऐसा लगता तो नहीं है ) फिर भी एक उम्मीद की किरण जरुर जगी है |


समाज  में हो रहें इस तरह के केस वो चाहें तेजाब फेंकना हो या किसी लड़की के साथ किया गया कुकर्म(दामिनी केस को मेरे ख्याल से कोई नहीं भूला होगा अभी तक ) मन को इतना बेचैन कर देते हैं कि क्या पता इस तरह का हादसा अपने किसी करीबी के साथ हो जाएगा ...तब ???

प्रश्न बहुत हैं इस मन में पर उसका कोई तसल्लीबख्श उत्तर कोई भी नहीं है ...भले ही पुलिस या सरकार ऐसी बातों पर कितना भी रोक लगा दे ...पर कुकर्म करने वाले करके चले जाते हैं |

अब  इस तरह की खबरों  को आप क्या कहेंगे ? कौन, कब और कहाँ कितना सुरक्षित है, आज इस बात की कोई भी गारंटी नहीं दे सकता |घर से सुरक्षित निकलने पर, जब लौट के आने का वक्त होगा ..क्या हम सही सलामत घर आ पाएंगे ?कोई नहीं जानता??????

और क्या कसूर है उन बच्चियों का जो आए दिन बलात्कार की शिकार बनती हैं और ज्यादातर अपनी जान से हाथ धो बैठती हैं ....अफ़सोस होता है अपने इस समाज पर ...अपनी सरकार और अपने आस-पास के लोगों पर




अंजु(अनु)



Friday, August 2, 2013

अब भी,मन करता है


              



आज फिर से 
एक बार
भीग जाने का
मन करता है
वो छत का
एक कोना पकड़ कर 

घंटे-दर-घंटे वहीँ
बैठ जाने का
अब भी,मन करता है |

घंटो-घंटो की बरसात में
नंगे पैरों से
छप-छप करते हुए
सूनी पड़ी सड़क पर
कहीं दूर भाग जाने का
अब भी,मन करता है |

बस्ते को प्लास्टिक से 

लपटे हुए
जुराबे-जूते

हाथ में पकड़े  हुए
खुद को जान-बूझ कर
भिगाते हुए
भीगते-भीगते
घर,भाग-भाग कर आने को
हर बार सोचते-सोचते
खुद पर हँसने का
अब भी, मन करता है |

मेरा प्राचीन वक्त
और
गैस पर चढ़ी वो कड़ाही,
अब भी माँ के हाथ के 

आलू और प्याज के पकौड़े,
खाने का मन करता है
वो दादी के हाथों की
चने की दाल की और
मीठी डोली*
चोरी करके,भागने का  

अब भी, मन करता है |

वो इमली,वो राम लड्डू 

वो  छोटे-छोटे बेर 
वो शतूत,वो भुने चन्ने
स्कूल  की कैंटीन के 
ब्रेड पकौड़े,समोसे 
और साथ में 
गरम-गरम चाय का कसोरा
और उसकी चुस्कियाँ
उफ़ उन कमबख्त यादों में
डूब जाने का
अब भी,मन करता है |


अब की,बरसात में भी
बिना कष्ट साँस लेती हूँ
अपने ही अंतहीन
संग्रह के लिए
खुद के आँसुओं को
सबसे छिपान के लिए
इस बरसात में भी
खूब भीगने का
मन करता है |
 
(*एक तरह की घर की बनी हुई कचौड़ी ) 
अंजु(अनु)

Monday, July 29, 2013

एक चिट्ठी अपने प्रिय के नाम

 (डायरी के पन्ने ....जो कहानी संग्रह के रूप में लिखे जा रहें हैं ....उसे कुछ हिस्से साथ साथ यहाँ ब्लॉग पर आप सबके साथ साँझा कर रही हूँ .....चित्र गुगल से लिया गया है )



प्रिय!तुम अपने जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए, ना जाने कैसे कैसे हथकंडे अपनाते हो |तुम जिंदगी के २ पड़ाव पार चुके हो, पर अब जब तुम्हें जीवन में एक स्थाई मुकाम मिला है तो ...मुझे मेरे जीवन की हर बात सोचने का मन करता है | क्यों,कब और कैसे पूरी जिंदगी बस घर के झमेलों  में ही निकल गई | तुमने अपना स्थान पा लिया और मुझे, अपने लिए सोचने का वक्त ही नहीं मिला |

शादी हुई और शादी होते ही नई दुल्हन के कोई चाव देखने को नहीं मिले, तो मन टीस उठी, अपेक्षाएँ आहत हुई, जब जब कुछ देखा या सुना  तो बस हर किसी को मुझे से कोई ना कोई उम्मीद या शिकायत ही रही ,मन और तन से मैं बार-बार टूटती रही ,फिर भी एक गहरी ख़ामोशी मेरे ही भीतर ..मुझ से ये सवाल जरुर करती थी कि  ''यार!(मेरा तकिया कलाम) क्या मैं ऐसी हूँ कि हर किसी को मुझ से सिर्फ शिकायत रहती है ''|

मन में विचारों का उद्गम जब भी हुआ है तो हमेशा नकारात्मक सोच ही सबसे पहले मन में घर करती है |सबके सामने, मुझे अपने आप को साबित करने के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ी ये कोई भी आम गृहणी आराम से समझ सकती है |कुछ सपने पूरे और कुछ अधूरे ही यादों के बस्ते में कैद पड़े हैं जो बाहर आने ले लिए अपने आप में मंथन मचाए हुए हैं ..और हर बार मेरा खुद से ये सवाल होता है कि '' यार! ये सपने इतना शोर क्यों करते हैं ?''

वास्तविक जीवन में कोई परेशां करे तो समझ में आता है ...पर ऐसे यूँ जाग कर सपने देखना और उनके पूरे होने की उम्मीद करना सत्य के धरातल पर कुछ मुमकिन हो ...ऐसा लगता तो नहीं है | मैं बहुत सपने देखती आई हूँ ..पर हर सपना पूरा हो ...ऐसा जरुरी तो नहीं है ना |

मेरी समस्या, मेरे शब्द और मेरी सोच है, जो मुझे कदम-कदम पर दुर्बल बनाती आई है,पर उसके बाद भी मैं बहुत अधिक यथार्थ और आशावादी हूँ| जीवन में कुछ भी हो जाने की स्थिति बहुत देर तक मुझ पर हावी नहीं रहती शायद ये ही मेरे जीवन का मूल-मंत्र है कि ''कुछ भी हो जाए,बस आगे बढ़ो'' ||

पर मेरी सबसे बडी सोच'' तुम '' हो कि तुम कब मुझे खुद सा समझोगे कि '' तुम्हारे जीवन में 'मैं कौन हूँ ' तुम्हारे लिए ?'' यह प्रश्न जाने-अनजाने हमारे जीवन में मुझे परेशां करने चला आता है | किन्तु मन में ये विचार भी बार-बार आता है कि क्या फर्क पड़ता है कि 'मैं कौन हूँ सिवाए इसके कि मेरा एक नाम है जो अब तुम से जुड़ चुका है और मैं एक शख्सीयत हूँ जिस से मैं अपने परिवार से जुड़ी हूँ' |

मैं खुद से मौज-मस्ती वाला जीवन जी रही हूँ ये सोच कर मुझे क्या जरुरत है इस बेकार की सोचों के झंझट में पड़ने की ...फिर भी पता नहीं क्यों एक अनचाही उदासी मेरे मन को घेर लेती है | फिर भी प्रिय ! मेरे पास जन्मों से संचित प्रेम और अपनेपन के अतिरिक्त ओर कुछ नहीं जो मैं तुम्हें और परिवार को समर्पित कर सकूँ, पर मेरी इस दुनिया के बाहर भी एक दुनिया ओर  है ...मेरी सोच और मेरे शब्दों की दुनिया...जिसे शायद ही आप कभी समझ सको,प्रिय !

(आगे भी सफर ऐसे ही जारी रहेगा ....मेरे साथ अंजु(अनु) चौधरी )







Saturday, July 27, 2013

हाय ये कुर्सी ! उफ़ ये कुर्सी








हाय ये कुर्सी ! उफ़ ये कुर्सी 
ओ! कुर्सी के निर्माता
एक कुर्सी मुझे भी भिजवा दो
गर्दन और कंधे का
दर्द मिटा दो ||





देखो ना...
इसी कुर्सी के लिए
नेताओं ने
देश के हिस्से
कर डाले
अपनों ने,अपने ही  

मार डालें
उफ़! इस कुर्सी की
महिमा है निराली
जो है आम जनता की
उम्मीदों पर भारी ||

ओ-कुर्सी के निर्माता
ये कुर्सी-लोक है
घूम-फिर कर
सबको यहीं 
है आना 
इस कुर्सी के लिए
हर गठबंधन
बनाया और तोड़ा जाता 
झूठे बयानों का छींका
किसी पर भी
फोड़ा जाता   

सबका सपना है
ये कुर्सी
अब ओर क्या कहूँ 
क्या क्या महिमा
कुर्सी की मैं बतलाऊं   |

हर नेता की आस है
राजनीति की चाल है
ये कुर्सी
 
हत्याधारी, अत्याचारी और
बलत्कारी का बचाव है
ये कुर्सी
कुर्सी की गिरफ्त में
गिरफ्तार हर कोई
उफ़! ये कुर्सी
हाय! ये कुर्सी |


पर,मेरे लिए भी
वरदान है
ये कुर्सी,
काम करने के बाद
कुछ पल आराम के देती है
ये कुर्सी ||


बस
मेरा ये काम करवा दो
दुआ दूंगी
हर वक्त तुम्हें 

इस अनचाहे
दर्द को मिटा दो
ओ-कुर्सी के निर्माता
एक कुर्सी...मुझ को भी                         
भिजवा दो !!!                                                           

            अंजु(अनु)