Friday, August 5, 2011

२१वीं सदी के रिश्ते....


२१वीं सदी के रिश्ते.....(एकल होते परिवारों का दुःख.......जो मैंने समझा है ....मेरे विचार ...मेरी कविता )



आज के मशीनी युग में
समय कुछ ज्यादा ही
महंगा हो गया है
आप सब अब
अवकाश निकालो
आप लोगो से दो
बाते हैं करनी ..कि
सोया है सबका विश्वास
उसे तो जगा लो ...क्यूँकि
आज रिश्तो की पहचान
कठिन सी हो गयी है......
हर रिश्ते में सिर्फ
प्यार की
iv> कमी सी हो गयी है....
माँ बाप और संतान का
रिश्ता सिर्फ पालन पोषण
और नसीहतो तक ही
सिमट कर रह गया है.....
क्या किया उन्होंने
संतान के लिए ?
ये प्रश्न उनके दिमाग में
प्रेत बन कर बैठ गया है
कुछ नहीं ????
सिर्फ
अपना फ़र्ज ही तो
निभाया है.....
बदले में कुछ चाहने
का उन्हें हक नहीं.....क्यूंकि,
बच्चो की अब
तो अपनी ही जिन्दगी
हो गई हैं ....... और
पति पत्नी का रिश्ता
भी तो सिर्फ
तनख्वाह दिन तक का
ही रह गया है......क्यूंकि
दोनों की अब अपनी अपनी
निजी जिन्दगी है भाई...
अजब सी दुनिया है ये ...
दिल में है क्या ..ना जाने कोई ....
क्यूँ ...आज पोते पोतिया,
दादा दादी को नहीं जानते.....
वो इस रिश्ते को नहीं पहचानते......
क्यूंकि ......बूढे माँ बाप
घर की शोभा बिगाड़ते है....
और उनकी आज़ादी में खलल डालते हैं
इस लिए वो लोग तो
वृद्धाश्रम में ही भाते है........
देखो तो ...भाई -भाई जान के
दुश्मन बन बैठे हैं ...
रिश्तो की मिठास की कमी
को अब स्वीट डिश
जो पूरा करती है.....
टूटे हुए रिश्तो का
आज दौलत से एक
अटूट रिश्ता जुड़ गया है......
फिर भी मैं ...ये ही कहूँगी कि .....
ढूंढ़ सकते हो तो ढूंढ़ लाओ
वो स्वयं के रिश्ते जो खो गए
है इस दुनिया के चलन में
वो पक्के धागों से रिश्ते ....
वो रिश्तो की सच्ची मिठास......
वो प्यार, वो बंधन...
वो हर चेहरे पर मुस्कान
वो हँसीं-ठिठोली का वातावरण
वो अपनों पर विश्वास
जो मिलता था सबको
एक .... संयुक्त परिवार में ....
((अनु))

29 comments:

Ehsaas said...

waqt ki maar hai...kuch apni kamzori....rachna sahi baat kehti hai


http://teri-galatfahmi.blogspot.com/

mahendra srivastava said...

वाह जी, क्या कहने। हकीकत से रुबरू करा रही है ये कविता

फिर भी मैं ...ये ही कहूँगी कि .....
ढूंढ़ सकते हो तो ढूंढ़ लाओ
वो स्वयं के रिश्ते जो खो गए
है इस दुनिया के चलन में
वो पक्के धागों से रिश्ते ....

बधाई

दीपक बाबा said...
This comment has been removed by the author.
दीपक बाबा said...

अपने रिश्तों से ..... बड़ी बड़ी बिल्डिंग में बैठे युवा कर्मचारी ... माँ और बाप से भी चेट पर बात करना चाहते है ...... रिश्तों की गर्माहट वो क्या समझेंगे...... वैसे अनुराधा जी.... आपके ये कविता आज के माहौल में फिट बैठती है .

kunwarji's said...

मार्मिक प्रस्तुति....

पर मुझे नहीं लगता कि इतनी भयावह स्थिति हमारे समाज में अभी है..... पर बहुत जल्दी.... शायद....

नहीं ऐसा न ही हो तो ठीक.....!



कुँवर जी,

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बहुत सही और बहुत ही बढ़िया।


सादर

संगीता पुरी said...

ढूंढ़ सकते हो तो ढूंढ़ लाओ

वो स्वयं के रिश्ते जो खो गए

है इस दुनिया के चलन में
वो पक्के धागों से रिश्ते ....
वो रिश्तो की सच्ची मिठास......
वो प्यार, वो बंधन...

वो हर चेहरे पर मुस्कान

वो हँसीं-ठिठोली का वातावरण

वो अपनों पर विश्वास

जो मिलता था सबको
एक .... संयुक्त परिवार में ...

सच्‍ची और सटीक अभिव्‍यक्ति !!

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

good

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आज के रिश्तों पर गहरी सोच ... अच्छी और सटीक प्रस्तुति

Maheshwari kaneri said...

रिश्तो पर एक मार्मिक प्रस्तुति....सुन्दर..

Mitesh aka SM said...

सुन्दर प्रस्तुति

amrendra "amar" said...

आज रिश्तो की पहचान
कठिन सी हो गयी है......
हर रिश्ते में सिर्फ
प्यार की
iv> कमी सी हो गयी है....

ANU JI SUNDER AUR BHAVOOK PRASTUTI KE LIYE HARDIK BADHAI, AAPNE BIKUL SAHI KAHA HAI AAJ KAL HER JAGEH , HER RISHTE ME PYAR KI KAMI SI HO GYI HAI ..................SARTAHK PRASTUTI KE LIYE AABHAR ...........HUM TO KAYAL HO GYA HAI AAPKI IS SUNDER RACHNA KE .....

वन्दना said...

गहरी सोच को दर्शाती रिश्तों की एक संवेदनशील प्रस्तुति।

नीरज गोस्वामी said...

आपने एकल समाज के दुःख दर्द और सच्चाई को परत दर परत उधेड़ दिया है...बहुत शशक्त रचना.

नीरज

रेखा श्रीवास्तव said...

HAM DAUD RAHE HAIN - EK AISI DAUD MEN KI JAHAN SIRPH MAIN AUR MAIN HI DIKHAI DETA HAI. RISHTON KE DARAKATE HUE ASTITVA KO BAHUT ACHCHHE SE VARNIT KIYA HAI.
BAHUT SUNDAR PRASTUTI .

S.M.HABIB said...

वाह ! बहुत ही सशक्त रचना है अनु जी....
स्वयम का आकाश तलाशने की होड़... रिश्तों के सिमटते दायरे... विघटित और विलुप्त होते पारिवारिक पृष्टभूमि की वेदना को मुखरता से अभिव्यक्त करती सशक्त रचना है यह....
सादर....

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

संयुक्त परिवार का मजा एकल परिवार में कहाँ? जीवन की आपाधापी में संयुक्त परिवार विघटन का संकट झेल रहा है। अच्छी कविता, आभार

Mukesh Kumar Sinha said...

वो प्यार, वो बंधन...
वो हर चेहरे पर मुस्कान
वो हँसीं-ठिठोली का वातावरण
वो अपनों पर विश्वास
जो मिलता था सबको
एक .... संयुक्त परिवार में ....

sach me mujhe yaad hai, apna bachpan , pure milakar ham ek dozen bhai bahan the....wo ladna hasna khelna, jabardasti ki behoshi ka natak karna, sabki sahanubhuti ekatrit karna...sab kahan raha....

raat me khane pe to line lag jaati thi , niche baith kar khane samay:D

bahut pyari si rachna....dil ko chhoo gayee kyonki purane din yaad aa gya...

aur ab akal parewar ...mera hi ..bachcho ko jabardasti kabhi kabhi akele flat pe band kar ke jana tak padta hai.........uff!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

नवयुग में रिश्तों की बात करना तो फिजूल ही लगता है!
आजकल की पीढ़ी यदि आदर के साथ दादीजी-दादा जी की कह दें तो वही बहुत है!
आपने बहुत मार्मिक अभिव्यक्ति पेश की है!

CS Devendra K Sharma "Man without Brain" said...

waakai.....rishton ki khoj aur pahchaan jaruri hai......

bahut saarthak rachna..

राजीव तनेजा said...

कटु सत्य को उजागर करती सुन्दर रचना

Kunwar Kusumesh said...

रिश्तों की खटास पर आपकी पोस्ट पढ़ते पढ़ते किसी का एक पड़ा प्यारा-सा शेर याद आ गया.सुनियेगा आप भी:-
करवटें लीं मेरे हालात ने जैसे जैसे.
दोस्त भी अपने बदलते गए वैसे वैसे.

Amit Chandra said...

सही कहा आपने। आज सारे रिश्ते पैसों तक सिमट कर रह गए है।

Rajiv said...

NICE REFLECTION OF TADAY'S SITUATION.CONGRATS.

નીતા કોટેચા said...

ekdam sahi kaha annu... ek ek rishta khokhla hota ja raha hai bas..kaha dhundhe apnapan...

DR. ANWER JAMAL said...

आपकी यह उत्तम रचना सोमवार को हमारे साथ आप देख सकते हैं ब्लॉगर्स मीट वीकली में। आपका स्वागत है।
http://www.hbfint.blogspot.com/

प्रतीक माहेश्वरी said...

पश्चिमी चलन है.. लोग चल रहे हैं और जल भी रहे हैं पर फिर भी रुकना नहीं चाहते..
ज़िन्दगी की इस दौड़-धूप में सोचना ही नहीं चाहते कि क्या सही और क्या गलत है..
अफ़सोस है ऐसी नासमझी पर.. पर दुनिया है.. अपनी धुन में चली जा रही है... और जनता-जनार्दन जली जा रही है..

आभार

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

अनु जी ,
मन मष्तिष्क को आंदोलित कर गयी आपकी रचना ....
'रिश्तों की मिठास' की यादें जो अब न के ही बराबर रह गयी हैं , आँखों को नम कर जाती हैं |
आधुनिकता की अंधी दौड़ हमें कहाँ ले जायेगी , सोच कर मन व्यथित हो जाता है |

संजय भास्कर said...

भावनाओं से परिपूर्ण, बेहद गहरी रचना.