Sunday, January 8, 2012

द्वंद


भावनाओं के समंदर में ,
भावों की एक नदी बहती हैं
जो इंसान को देती हैं ...
अपने ही डर से डरने की वजह
एक सिकुडन,एक असुरक्षा का भाव
जो एक रेखा खींचती है
अपने ही मन के भीतर |

कितने पधारे ,कितने विराजे
कितने आये ,कितने गए
किस किस ने अपना स्थान बनाया ,
जाने कितने वर्षों से
इन इंतज़ार की घड़ियों में
पल पल हम अपने मन का
मंथन करते रहे
सोचते रहे ,एक ऐसा क्षण
जहाँ अपनी ही खुशियों का
हो कोई एक पल का स्मरण ?

खुद के विचारों के डाकू
डाका डालते हैं ,खुद के अस्तित्व पर
जो जीने नहीं देते ,
अहम के बादल कोहरा बन कर
दिल और दिमाग पर छाये रहते हैं
और झुकने नहीं देते ,
अपनों के आगे ..
विचारों का ना मिलना और
विचारों के द्वंद की तोड़-मोड
चलती रहती हैं
भीतर ही भीतर ,
जो अकेला कर के रख देती है
अपनों के बीच ,
उम्र के किसी भी पड़ाव पर ||


अनु

40 comments:

dheerendra said...

बहुत बढिया प्रस्तुति,मन की भावनाओं की सुंदर अभिव्यक्ति ......
WELCOME to--जिन्दगीं--

दर्शन कौर 'दर्शी' said...

bahut badhiya ..

Fatan said...

APANA AHAM AUR DUSRON KI APEKCHAON KO JISS DIN HUM BHOOL JAYEGE SWATANTRA ROOP SE APNE LIYE HI JIYENGE BINA KISI LAG-LAPET KE AUR WO HO NAHIN PATA GHAR PARIWAR AUR SAMZIKTA KI DUHAYEE WALE CHADAM BANDHANO KI WAZAH SE............ BAHUT SUNDER, PINZRE ME KAID MANN KI CHAT-PATAHAT KA SUNDAR WARNAN............

Fatan said...

he mere mann meri peer ko aisa karde dikhe na wo aur kisi aur ko bhi na peer pahunchaye

નીતા કોટેચા said...

aham ke badal kohra ban ke dil aur dimag par chaye rahete hai, aur jukne nahi dete hai apno ke aaage..

kitnaa sahi kaha hai annu...

amrendra "amar" said...

bahut sunder prastuti..........
manko chu gayi aapki ye anupam prastuti

सदा said...

वाह ...बहुत ही बढि़या।

दिलबाग विर्क said...

द्वंद्व का सुंदर चित्रण

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बेहतरीन।


सादर

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

कल 10/01/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

रविकर said...

सुन्दर प्रस्तुतीकरण ||

रेखा श्रीवास्तव said...

जीवन के द्वन्द को बहुत अच्छे ढंग से पेश किया है. बधाई .

shikha varshney said...

सच्ची अभिव्यक्ति .

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत उम्दा लिखा है आपने!
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

आशा said...

बहुत सुन्दर भाव लिए रचना
आशा

काजल कुमार Kajal Kumar said...

मनोभावों की दुनिया वास्तव में ही एक बहुत क्लिष्ट संसार है

उपेन्द्र नाथ said...

बहुत ही भावपूर्ण कविता... गहरे एहसास के साथ सुंदर प्रस्तुति.

हरीश जयपाल माली said...

वाह...लाजवाब ख्यालों का द्वन्द है!
इसी उलझन में मैं हर रोज जीता हूँ की जिंदगी कभी सुकून तो कभी बेसुकून क्यों होती है....!

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

खुद के विचारों के डाकू
डाका डालते हैं..... वाह!
एकदम नया विचार.... बहुत अच्छी रचना...
सादर बधाई...

Rajput said...

बहुत सुन्दर भाव और एक खुबसूरत रचना
बधाई

Rakesh Kumar said...

बहुत अच्छी लगी आपकी यह भावपूर्ण प्रस्तुति.
विचारों के डाकू भी होते हैं,
और सन्त भी.

विचारों के सन्त मिलने से जीवन धन्य हो जाता है जी.

Urmi said...

बेहद ख़ूबसूरत एवं उम्दा रचना ! बधाई !

अमित श्रीवास्तव said...

कितने आये कितने गए...

sach...

RITU said...

सही है हर पल विचारों का द्वन्द चलता रहता है
जीवन में ..सही गलत को तराजू में तौल कर ही मष्तिष्क में उतारना इन द्वंदों से छुटकारा दिला सकता है ..
ऐसा मई सोचती हूँ
पधारें - kalamdaan.blogspot.com

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सबके मन में ऐसा द्वन्द्व चलता है .. अच्छी प्रस्तुति

संजय भास्कर said...

बहुत खूबसूरत रचना है अनु दी
आपकी रचनाएँ हमेशा कुछ अलग ही सोचने को विवश करती हैं..... सुंदर रचना

वन्दना said...

सुन्दर अभिव्यक्ति।

कुश्वंश said...

सुंदर प्रस्तुति....

vidya said...

बहुत बढ़िया भावाव्यक्ति...

मनीष सिंह निराला said...

bahut sundar prastuti !

ईं.प्रदीप कुमार साहनी said...

बहुत ही बढ़िया रचना |

मेरे भी ब्लॉग में पधारें |
मेरी कविता

मनोज कुमार said...

इस तरह के द्वन्द्व से बाहर निकल कर सही मार्ग प्रसस्त करने वाला ही अंततोगत्वा मंजिल पर पहुंचता है।

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

प्रिय अनु जी मन के भीतर चलते द्वन्द को सटीक उकेरा आप ने ..
विचारों का ना मिलना और .....विचारों के द्वन्द की तोड़ मोड़ ...
इस द्वन्द से निकल के ही कुछ राह मिल पाती हैं ..सुन्दर मूल भाव
जय श्री राधे ..नव वर्ष आप सपरिवार और सभी मित्र मण्डली के लिए मंगलमय हो
कृपया कुछ शब्दों को हिंदी बनाते समय ठीक कर लिया करें
जैसे ...भावनाओं ....भावों ...सिकुड़न.....तोड़ मोड़

भ्रमर ५
बाल झरोखा सत्यम की दुनिया

Vikram Singh said...

मन के भीतर उपजे द्वन्द की भावपूर्ण अभिव्यक्ति...


vikram7: हाय, टिप्पणी व्यथा बन गई ....

प्रतीक माहेश्वरी said...

सही में.. यह द्वंद्व तो हर एक इंसान की ज़िन्दगी का हिस्सा है जो उसके दुःख और सुख का मापदंड तय करती है..
और इससे बचा भी नहीं जा सकता बस लड़ सकते हैं.. सच्चे पहलू को उन्केरा है आपने इस पोस्ट में.. अच्छा लगा...

प्यार में फर्क पर अपने विचार ज़रूर दें...

दिगम्बर नासवा said...

भाव पूर्ण ... मन के द्वन्द को बाखूबी लिख दिया है आपने ...

NISHA MAHARANA said...

very nice.

somali said...

realy great mam......

Sanju said...

बहुत बेहतरीन और प्रशंसनीय.......
मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

Reena Maurya said...

सुन्दर भावाभिव्यक्ति