Wednesday, April 25, 2012

मेरे कविता संग्रह .......क्षितिजा की पहली कविता .....

असमंजस ......
लिखते लिखते रूकती ,
लेखनी का असमंजस
पढने के बाद ,
समझ का असमंजस
दो राहे पर खड़े ,
बचपन का असमंजस
अंतिम पड़ाव पर ,
वृद्धावस्‍था का 
असमंजस
तूफ़ान की कालरात्रि में ,
गिरती बिजली का असमंजस
सागर के किनारों पर ,
टकराती लहरों का असमंजस
मन में उठते प्रश्नों को ,
उत्तर देने का असमंजस
अजीब सा एहसास और ,
रूकती सांसों का असमंजस
झड़ते पत्तो  और ,
बुझते चिरागों का भी असमंजस 
  लुटती अस्मत में ,

बहते लहूँ का असमंजस
पेट की आगे में ,
झुलसते बचपन का असमंजस
टूटते सपनो का ,
बिछड़ते अपनों का असमंजस
इंसान होने के साथ
कविह्रदय होने का असमंजस ||


अनु






31 comments:

महफूज़ अली (Mahfooz Ali) said...

बहुत ही सुंदर कविता...

महफूज़ अली (Mahfooz Ali) said...

बहुत ही सुंदर कविता...

अरूण साथी said...

सच है कि जिंदगी असमंजस मे ही बीत जाती है, बधाई।

अरूण साथी said...

सच है कि जिंदगी असमंजस मे ही बीत जाती है, बधाई।

vk said...

Bahut umda .....
Man ka haal likha he...

रविकर फैजाबादी said...

बहुत सुन्दर ।

बधाई अनु जी ।।

dheerendra said...

झुलसते बचपन का असमंजस
टूटते सपनो का ,
बिछड़ते अपनों का असमंजस
इंसान होने के साथ
कविह्रदय होने का असमंजस |
|
बहुत सुंदर प्रस्तुति,..प्रभावी रचना,..
अनु जी,...बधाई

MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: गजल.....

मनोज कुमार said...

इन्हीं असमंजसों के बीच सामंजस्य बनाने का नाम ही तो ज़िन्दगी है।

kase kahun?by kavita verma said...

sundar rachna..

Dr. sandhya tiwari said...

bahut sundar bhav -----jindgi ke baare me sabki apni apni sonch hoti hai

वन्दना said...

बहुत खूबसूरती से भावों को उकेरा है ।

क्षितिजा .... said...

बहुत खूबसूरत रचना ... !

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

Bahut Sunder...

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

क्या बात है!! बहुत सुन्दर

Naveen Mani Tripathi said...

behatreen rachana ...bahut bahut abhar Anju ji

amrendra "amar" said...

टूटते सपनो का ,
बिछड़ते अपनों का असमंजस
इंसान होने के साथ
कविह्रदय होने का असमंजस ||
bahut sanvedi rachna ..........

Rewa said...

wah...beautiful lines

Maheshwari kaneri said...

sari jindagi kaibar asamaj me gujar jati hai....satik rachna...

दिलबाग विर्क said...

आपकी पोस्ट कल 19/4/2012 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें

चर्चा - 861:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

Anita said...

क्षितिजा के लिये बधाई...पहली कविता ही इतनी प्रभावशाली है, आशा है शेष भी पढ़ने को मिलेंगी,

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बधाई हो!
कभी अवसर मिला तो पुस्तक पढ़ने की अभिलाषा हम भी रखते हैं!
--
बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति...!

अमित श्रीवास्तव said...

अति खूबसूरत

vikram7 said...

सुंदर कविता

श्यामल सुमन said...

सुन्दर भावाभिव्यक्ति

Kailash Sharma said...

अंतस की भावनाओं का बहुत सुंदर चित्रण...

Ramakant Singh said...

इंसान होने के साथ
कविह्रदय होने का असमंजस ||
kasmkas fir bhi kuch to hai jo aage chalane sochane ko majabur karata hai.

Suresh kumar said...

Bahut hi khubsurat rachna...

सतीश सक्सेना said...

अच्छी रचना है ....
शुभकामनायें !

काजल कुमार Kajal Kumar said...

यह जीवन ही स्‍वयं में एक असमझ है

Minakshi Pant said...

वाह बहुत खूब ये रचना पढकर लगता है की जीवन का नाम ही है असमंजस बहुत सुन्दर शब्द को लेकर लिखी रचना ..............असमंजस |

दिगम्बर नासवा said...

पूरा जीवन यूं ही असमंजस में निकल जाता है कभी कभी ... सुन्दर रचना है ...