Friday, May 20, 2011

प्यार की बलि





प्यार की बलि

फिर रिश्तो की दुहाई
ये जात पात का अंतर
ये गरीब की रेखा
जो बांधी ..है
अमीरों ने ..
दिल से दिल का है
मिलन ...
फिर क्यों ये जिन्दगी है
इस तलवार की धार पे
याद आने पर बन गई
बीते लम्हों की कसक
मजबूरी का तो
बन गया है साया
मेरे दिल की दीवार पे
मैंने जो ख्याब बोया था
वो हकीकत में खिला नहीं
जिसे से इज़हार किया
उसने इस समाज के डर से
स्वीकार किया नहीं ...
बिन बोले तनहा रहीं
तड़पती रहीं खुद की
बेज़ुबानी पे.....
होगा दो दिलो का मेल
ये सोच भी दगा दे गई.....
आँखों की भाषा
भी खूब बरसी मेरे
इस व्यथित मन पे
लगी चोट मेरे दिले -अफ़गार पे
(((अनु ))))


दिले -अफ़गार ...(बेचैन दिल की तड़प )




















चित्र आभार......रोज़ी सचदेवा

33 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत मार्मिक प्रस्तुति

man na vicharo said...

sach bahut badhiya bat...aur satya bat..

रश्मि प्रभा... said...

shabd shabd bol rahe hain

संजीव said...

तड़फ मुखर है, धन्‍यवाद.

Mukesh Kumar Sinha said...

rashmi di ne sahi kaha....anju aapke blog ke post ki yahi khasiyat hai..apke har sabd mukhar hote hain...aur lagta hai har shabd jee raha ho........

Babli said...

टिप्पणी देकर प्रोत्साहित करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया!
बहुत सुन्दर और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! बधाई!

SAJAN.AAWARA said...

Man ki pida ko darsati , marmik rachna hai. . . . Acha lagta hai apki rachna padhna .
Jai hind jai bharat

वन्दना said...

बेह्द मार्मिक चित्रण्।

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बहुत ही मर्मस्पर्शी है आपकी कविता.

सादर

Vikas Nagpal said...

ye aankho ki basha bhi bahut kuch bolti hai .........

अमित श्रीवास्तव said...

bahut khoob..

sundar rachna..

Suman said...

nice

Sunil Kumar said...

खुबसूरत अहसास बधाई

ehsas said...

सुन्दर रचना। दिल को छुती है।

अरुण चन्द्र रॉय said...

आपकी इस कविता में प्रेम करने वाले ह्रदय की पीड़ा मुखरित हुई है.... समाज में प्रेम की जो परिणति हुई है उसका भी मार्मिक और संवेदनात्मक चित्रण है... बहुत खूबसूरत कविता... खुद को आपके दर्द से जोड़ते हुए शुभकामना !

उपेन्द्र ' उपेन ' said...

gahre ehsas ke sath sunder prastuti......

निवेदिता said...

बहुत ही अच्छा लिखा है ......साथ में चित्र .....क्या बात है प्रभाव और भी बढ़ा गया .......

Amrita Tanmay said...

बहुत सुन्दर लिखा है.एक-एक शब्द प्रभावी . .आभार

रेखा श्रीवास्तव said...

अनु जी,

आज भी प्यार का हश्र यही हो रहा है, और उससे पैदा हो रहे नए नए विकल्प. ये भावना तो सिर्फ दिल में पलती रहे और फिर दम तोड़ देती हैं लेकिन प्यार जो एक बार पलता है न कभी मारता नहीं है . भले जीवन के झंझावातों में वह पीछे हो जाये लेकिन अगर प्रिय मिल गया तो आँखें छलक ही आती हैं. .

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 24 - 05 - 2011
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

साप्ताहिक काव्य मंच --- चर्चामंच

udaya veer singh said...

samyik chintan par prayas sarhniya hai .

ललित शर्मा said...

सुन्दर सम सामायिक कविता के लिए आभार

डॉ० डंडा लखनवी said...

भारत में सदियों तक शिक्षा के दरवाजे सूद्रों और नारी के लिए खुले न थे। "मैं जो चाहूँ सो करूँ....मेरी मर्ज़ी" वाला सिद्धांत यहाँ प्रभावी रहा। यह सिद्धांत ताकत का परिचायक रहा है। आप इसे जंगलराज वाला सिद्धांत कह सकते हैं। ऋषियों ने इस सिद्धांत की व्याख्या "वीर भोग्या वसुंधरा" रूप में की है। वीरों ने आम आदमी को दास और नारियों को दासी समझा। दास और नारियाँ उनके लिए भोग की वस्तु थे, धन थे। जातिवाद, पर्दा-प्रथा, सती-प्रथा, बाल-विवाह, देवदासी-प्रथा जैसी अनेक प्रथाओं में नारी को जकड़ा गया। लोगों ने उनकी बातों को अपना आदर्श समझ कर अपना लिया। उसी मानसिकता के लक्षण हैं-’कन्या को कन्या नहीं दान की वस्तु समझा जाता है। जिस कन्या को माँ-बाप जन्म देते हैं वे उसे पराया धन मानने लगते हैं। दलितों और पिछड़ों की भाँति समाज के कमजोर वर्ग में नारियाँ भी आती हैं। माना कि मीडिया का कवरेज दास और दासी के रूप में नहीं होता। स्थिति आज भी वही है। जब भारी संख्या में आम आदमी प्रताड़ित किए जाते हैं, जलाए जाते हैं तो उसे दंगा कहा जाता है। जब केवल दासी (आम नारी) प्रताणित की जाती है, जलाई जाती है तो उसे दहेज-हत्या कह दिया जाता है। दहेज-हत्या-शोषण का घिनौना रूप है। आज भी बर्बर युग की बहुत गहरी जड़ें हमारे समाज में विद्यमान हैं। जिस देश का समाज जितना सभ्य होगा उस देश में लोकतांत्रिक शासन-प्रणाली उतनी ही कामियाब होगी। आम नारी और आम पुरूष की आवाज सुनी जायगी। आनर-किलिंग वहाँ नहीं होती जहाँ सहिष्णुता चिर-स्थायी होती। जहाँ जाति, धर्म, भाषा तथा लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं होता है।
=======================
सद्भावी - डॉ० डंडा लखनवी

नश्तरे एहसास ......... said...

दिल को छूती हुई,मार्मिक प्रस्तुति......
बहुत पसंद आई हमने आपको फौलो कर लिया है! !:) :)

सदा said...

भावमय करते शब्‍दों के साथ बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

Jyoti Mishra said...

beautiful depiction of pain.
nice post !!

संजय भास्कर said...

मर्मस्पर्शी कविता बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

अजय कुमार झा said...

बहुत ही सुंदर , सरल शब्दों का संयोजन इतना प्रभावी और मादक भी हो सकता है ...वाह । शुभकामनाएं दोस्त ..लिखती रहें

M VERMA said...

सरल शब्दों में सुन्दर रचना

Mukesh Kumar Sinha said...

wah jee wah....charcha manch pe bhi ho aap:)

anju choudhary..(anu) said...

charcha manch ka bahut bahut shukriya....

Pintu said...

Jab main chhoti thi school ka rasta lamba tha
yaad hai ki halwai, toy shop,icecream,chandni chaat, kulfi kya nahi tha
ab'mobile shop,internet cafe aur maal hain . per wo shaan nahin.Jab main
chhoti thi Shayad duniya simat rahi hai
Shayad duniya simat rahi hai

Jab main chhoti thi shaamein bahut lambi hua karti thin
ghanton patang bazi, wo cycle race,wo chor-sipahi, gilli-danda
thak kar choor ho jaana
Ab shaam nahin hoti din dhalta hai aur sidhey raat hoti hai
Shayad waqt simat raha hai
Jab main chhoti thi tab dosti bahut gahri huaa karti thii
dinbhar tolli bana kar ghumna,doston ke ghar khanna khana
wo saath rona saath sona saath khaana

dosti kahaan hai ab? rahon par milte hain 'Bye' kertey huye badh jatey hain
Nay Saal , Janam-din Holi Diwali bas 'sms' aate hain
Shayad rishtey badal rahey hain

Jab main chhoti thi tab khel bhi ajeeb hua kerte they
chhpan-chhupai, chor-sipahi langri taang, tipi tipi top


ab internet, office, T.V. se fursat hi nahin milti
Shayad zindgi badal rahi hai

per sab se bara sach na badla jo 'shamshaan bhuumi' ke bahar board per

likha hai
''Manzil to yehi thii, bas zindgi guzar gayi aate aate...... SIYA

रविकर फैजाबादी said...

मित्रों चर्चा मंच के, देखो पन्ने खोल |
आओ धक्का मार के, महंगा है पेट्रोल ||
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